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उत्तर प्रदेश में अफसरों का सियाशी प्रेम

क्या आपको यूपी के आईएएस अफसर राय सिंह का नाम याद है? याद कीजिए 1995 का वक्त जब सूबे में मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं. उस समय इस पगड़ीधारी सिख अफसर को ‘सुपर सीएम’ के नाम से पुकारा गया.

मुलायम सिंह यादव को हटाकर राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मायावती को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी. इसके तुरंत बाद से राय सिंह के नाम की तूती बोलने लगी. राय सिंह कोई बहुत सीनियर अफसर नहीं था लेकिन शासन के मामलों में उसकी आन-बान लगभग मुख्यमंत्री जितनी थी. बहरहाल, मायावती ने धीरे-धीरे राय सिंह को किनारे कर दिया.

यूपी में राय सिंह जैसे अफसरों के सितारे का चमकना और बुझना नियम का अपवाद नहीं. ऐसे उदाहरणों का यहां एक पूरा सिलसिला रहा है और, यह बात मायने रखती है क्योंकि सियासी मन-मिजाज वाली इसी नौकरशाही पर देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में चुनाव कराने की जिम्मेदारी होगी.

चुनावों में जरुरत से ज्यादा दिलचस्पी रखने और पर्दे के पीछे बैठकर मनमाफिक सीन खड़ा करने वाले अफसरों के यूपी में खूब किस्से मिलते हैं. शायद यूपी जाति और सियासी लकीर पर बंटी इस या उस पाले में निष्ठा रखने वाली नौकरशाही का सबसे उम्दा उदाहरण है.

मायावती के मुख्यमंत्री रहते सुपर सीएम जैसी ऐंठ दिखाने वाले राय सिंह के सितारे जिस तेजी से चमके उसी तेजी से बुझे. लेकिन यह बात अखिलेश यादव के शासन वाले यूपी पर लागू नहीं होती. अखिलेश यादव और उनके कुनबे की सियासी सरपरस्ती की संस्कृति ने अपने पाले में काम करने को हरचंद तैयार नौकरशाहों की भारी-भरकम तादाद बना रखी है. ये नौकरशाह अपने-अपने दायरे में मिनी सीएम जैसा ही बर्ताव करते हैं. इन अफसरों का अपना निजी बहुत-कुछ चुनाव के नतीजों से तय होना है.


नौकरशाहों को पालने-पोसने का चलन

इसमें कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश ने देश को कुछ बहुत काबिल नौकरशाह दिए हैं. इन अफसरों का काम-काज एकदम बेदाग रहा है. लेकिन यह कहकर इस हकीकत को खारिज नहीं किया जा सकता कि आजादी के बाद के दिनों से ही सूबे में सियासी मन-मिजाज वाले नौकरशाहों को पालने-पोसने का चलन रहा है.

मिसाल के लिए 1947 के बाद का वक्त याद कीजिए. तब गोविन्दवल्लभ पंत के जमाने में सूबे के प्रशासन में ब्राह्मण और खासकर कुमाऊं इलाके के लोग बड़ी तादाद में भरे गये. उस वक्त से तकरीबन चलन बन निकला कि सूबे की नौकरशाही का रंग-ढंग मुख्यमंत्री की जाति से तय होगा.

पंत के तुरंत बाद बाबू संपूर्णानंद शास्त्री मुख्यमंत्री बने. वे लगातार छह साल तक मुख्यमंत्री रहे और इस दौरान सूबे की नौकरशाही कायस्थों से भर गई. उन्होंने लखनऊ के सचिवालय में बहुत से कायस्थों को रखवाया. राजपूत मुख्यमंत्री राजपूत जाति के नौकरशाहों का घेरा खड़ा करने में मददगार रहे. फिर भी, ब्राह्मण जाति के नौकरशाहों की बहुतायत रही और उनका रौब-दाब भी सबसे ज्यादा कायम रहा.

ऐसे ही सूरते-हाल में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशीाराम ने ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड मायनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्पलाईज फेडरेशन (बामसेफ) नाम से सरकारी कर्मचारियों का एक यूनियन खड़ा किया. यूनियन ने अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के सरकारी कर्मचारियों को एक मंच पर ला खड़ा किया.

1990 के दशक से बामसेफ सूबे की नौकरशाही में अगड़ी जातियों के दबदबे का असरदार काट साबित हुआ. अनुसूचित जाति के शीर्ष के नौकरशाहों ने कांशीराम के लिए फंड जुटाना शुरू किया और सियासत के मुख्य मंच पर हक जमाने के लिए पार्टी-कार्यकर्ताओं की तरह काम किया.

मुख्यमंत्री के रूप में मायावती के पहले कार्यकाल के दौरान राय सिंह जैसे नौकरशाह का सुपर सीएम बनकर उभरना कांशीराम की पहले से चली आ रही राजनीति का तार्किक नतीजा था.

 

बहरहाल, ‘मंडल’ के बाद वाले दौर में मुलायम सिंह यादव और उनके कुनबे का सियासी सितारा चमका. इस दौर में खुलेआम सूबे की नौकरशाही का यादवीकरण हुआ. मिसाल के लिए पुलिस कांस्टेबल, राज्य-कर्मचारी और लोक सेवा आयोग के अधिकारी तक बड़ी तादाद में यादव जाति से बनाये गये. यह अपने पाले में काम करने को हर घड़ी तैयार रहने वाली नौकरशाही बनाने का ही सियासी खेल था.

यही वजह है जो सूबे में कुछ नौकरशाह अपने कद से कहीं ज्यादा बढ़े-चढ़े नजर आते हैं और राज्य की सियासत को हांकते दिख पड़ते हैं. राय सिंह में तो खैर दिखावा ज्यादा था लेकिन याद करें एक और आईएएस अफसर एपी सिंह को.

वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्री पद पर रहते प्रशासन की बागडोर तकरीबन एपी सिंह के हाथों में थी. एपी सिंह बाद में मुख्य सचिव के पद पर बैठाये गये. उनपर केंद्रीय एजेंसियों की जांच बैठी और घर पर छापा भी पड़ा.

इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री की जाति-बिरादरी का होने के कारण एपी सिंह को उनके औकात से ज्यादा तवज्जो मिली. मायावती के वक्त के एक और ताकतवर आईएएस अफसर पीएल पुनिया थे. रिटायर्मेंट के बाद वे कांग्रेस पार्टी में आ गये, बाराबंकी लोकसभा सीट से दो दफे (2004 और 2009) चुनाव लड़े और जीते.

बीते दो दशक में जो चीज सूबे की नौकरशाही के राजनीतिकरण के नाम पर शुरू हुई वह आखिरकार प्रशासन के भरपूर अपराधीकरण और बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार का कारण बनकर उभरी है.

नोएडा में यादव सिंह सरीखे सरकारी अफसरों की अहमियत और चलती-बढ़ती से यह डर और पुख्ता हुआ है कि नौकरशाही का इस्तेमाल पार्टियां राजनीतिक फंडिंग जुटाने में कर रही हैं. भ्रष्टाचार के आरोप में सीबीआई के हाथों गिरफ्तार नोएडा के यादव सिंह मायावती और अखिलेश यादव दोनों के लिए अहम रहे हैं.

राजनीतिक कार्यकर्ता के समान बरताव करने वाले आईएएस और आईपीएस अफसरों के ऐसे कई किस्से हैं जिससे सूबे की नौकरशाही की निष्पक्षता को लेकर शक पैदा होता है.

सूबे में अपनी पसंद की सरकार कायम होने पर ‘मिनी सीएम’ बने इन लोगों का स्वार्थ चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों से कहीं ज्यादा सधना है. विडंबना कहिए कि लोकतंत्र को तबाह करने वाली यह बुराई हमारे चुनावों में बेरोक-टोक जारी है.

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