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कारवां गुज़र गया गुबार देखते रह गए शिवपाल…

बड़े भाई मुलायम सिंह के लिये शिवपाल हनुमान की भूमिका में रहे लेकिन अब हनुमान को ही राजनीतिक वनवास मिला

यदुकुल की महाभारत में न कोई चाचा था और न कोई भतीजा. पिता-पुत्र के रिश्तों का अंतर्द्वंद्व बाहर फूट कर छलक रहा था. चक्रव्यूह में अभिमन्यु को घेरने की कोशिश जारी थी. एक साथ कई किरदार कई भूमिकाएं एक ही वक्त में निभा रहे थे. क्लाइमेक्स पर पहुंचने के बाद फैमिली ड्रामे का पटाक्षेप हुआ. एक विजेता उभरा जिसने समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ दी. पार्टी में मौजूद पुराने समाजवादियों के गढ़ नेस्तनाबूद हो गए. हौसलों के तंबू उखड़ गए. ऐसे पतझड़ की आंधी चली कि राजा को कहना पड़ गया कि ‘मेरा पास क्या बचा है. जो कुछ भी था वो अखिलेश ले गए’.




वाकई अखिलेश सबकुछ ले गए. लेकिन पीछे छोड़ गए हारे हुए और हताश शिवपाल सिंह यादव को. वो नाम जिसके बिना मुलायम सिंह का नाम भी अधूरा है. खुद मुलायम ये बार बार कह चुके हैं कि शिवपाल ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है.

भाई ने भाई के राजनीतिक करियर के लिए अपना खून-पसीना एक किया. इटावा से यूपी तक शिवपाल सिंह यादव नाम ही काफी है. लेकिन ये बड़ा नाम जो सूबे में समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष रहा वो अब अपने ही नाम के वर्तमान में कहीं छुप गया है.

4 अक्टूबर 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन से अब 25 साल तक शिवपाल बड़े भाई मुलायम सिंह के लिये हनुमान की भूमिका में रहे.लेकिन अब हनुमान को राजनीतिक वनवास मिला.

हाथ से धीरे धीरे सारे पद, मंत्रालय फिसलते चले गए. शिवपाल सियासत के दांवों के समझने में भूल करते चले गए. छोड़े अखाड़े में बड़ी लड़ाई लड़ने की कोशिश उन्हें भारी पड़ गई.

आज शिवपाल के साथ कोई नहीं है. अखिलेश कह ही चुके हैं कि तमाम विवादों के बावजूद उनका पिता के साथ रिश्ता नहीं बदल सकता है. सच्चाई भी यही है कि नेताजी उनके पिता थे और वो रहेंगे.

लेकिन भतीजे के साथ शिवपाल का पुराना रिश्ता अब खत्म हो गया. सत्ता के संघर्ष में जो साथी बने थे या जिन्होंने शिवपाल को ये राह सुझाई थी वो फिर से ‘बाहरी’ हो गए.

जिन्होंने पार्टी और परिवार की टूट को रोकने की कोशिश की वो फिर से मुलायम-अखिलेश के करीबी हो गए.

लेकिन शिवपाल अब तो वहां भी नहीं रहे जहां वो पहले हुआ करते थे.हालात ये रहे कि शिवपाल के टिकट के लिये अब मुलायम को अखिलेश को समझाना पड़ा.जबकि कुछ दिन पहले तक यही नाम 400 उम्मीदवारों को टिकट देने का माद्दा रखता था.

शिवपाल को राजनीति में भी मुलायम सिंह ही लाए. पहली दफे वो इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए. बाद में मुलायम सिंह ने ही उनको जसवंत नगर की सीट सौगात के रूप में दी जहां से शिवपाल ने राजनीतिक पारी की शुरुआत की.

यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार में शिवपाल ने कृषि मंत्रालय, बिजली विभाग और पी डब्ल्यू डी मंत्रालय संभाला. ग्रामीण विकास बैंक उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे तो यूपी कैबिनेट की मंत्रीपरिषद के अध्यक्ष भी रहे.

चार भाइयों में शिवपाल सिंह यादव को मुलायम ने राजनीति में आगे बढ़ाया. मुलायम के साथ ही परछाई बन कर शिवपाल रहते रहे. अगर मुलायम राजनीति के शिखर पर पहुंचे तो उसमें शिवपाल की बड़ी भूमिका रही.

लेकिन समाजवादी पार्टी के पच्चीस साल का समारोह मुलायम के परिवारवाद पर साइकिल चढ़ा गया.मंच पर अखिलेश-शिवपाल के बीच बहस हुई तो बाहर अखिलेश और शिवपाल के कार्यकर्ताओं के बीच हाथापाई.

मुलायम की फटकार भी असर नहीं डाल सकी. मुलायम ने कहा कि वो शिवपाल को कभी नहीं छोड़ सकते. तो अखिलेश ने कहा कि चाचा के आरोप झूठे हैं कि वो नई पार्टी बनाने जा रहे हैं.

शिवपाल कसम खा कर कहते रह गए कि, ‘अखिलेश ने कहा था कि वो सारे विधायकों को लेकर नई पार्टी बना लेंगे.’

चाचा ने गलत तो नहीं कहा था. चाचा को जो शक था वो सही भी साबित हुआ. भतीजा पिता को पीछे छोड़ कर चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंच गया. वहां से पार्टी भी ले ली और साइकिल भी उठा लाया.

सवाल ये है कि क्या मुलायम सिंह ये सब नहीं जानते थे?  क्या पूरे विवाद के पीछे मुलायम का मौन वाकई उनकी बेबसी थी या फिर मौन सहमति थी ?

अखिलेश के हाथों शिवपाल सिंह को मंत्रीपद से बर्खास्त कर दिया गया.

शिवपाल का दर्द भी छलका. उन्होंने कहा कि ‘जिन्होंने कुर्बानी दी उन्हें कुछ नहीं मिला. कुछ लोगों को विरासत में मिला जाता है और कुछ लोग जिंदगीभर मेहनत करते रह जाते हैं लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिलता.’

शिवपाल ने कहा कि ‘उन्होंने अखिलेश सरकार के साथ बेहद सहयोग किया और आगे भी वो त्याग करने के लिये तैयार है. उन्होंने कहा कि पार्टी के लिए वो खून देने को तैयार है.’

अब त्याग ही शिवपाल के हिस्से में आया और वो खून का घूंट पीकर खामोश हैं. जसवंत नगर की जमीन पर अपने पुराने सियासी दिन उन्हें याद आएंगे. क्योंकि वो सबकुछ लुटा कर जसवंत नगर अपनी पुरानी पहचान तलाशने आए हैं.

अब अखिलेश की समाजवादी पार्टी में शिवपाल की नई पारी है. बहरहाल राजनीति में कौन किसका सगा है. आज जो अकेला है वो अपनों का ही ठगा है.

नीरज की ये अलग अलग पंक्तियां एक साथ जोड़ने पर सियासत का फलसफा भी कुछ ऐसा ही सुनाई देता है.

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,

पांव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,

पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,

चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे.



Saabhaar-Kinshuk Praval firstpost

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