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दम पूरा लगाया, पर पश्चिमी यूपी में नहीं चल पाया हिंदू कार्ड,रालोद के पक्ष में रहे जाट

पहले चरण के मतदान वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पंद्रह ज़िलों की आबादी में मुसलमानों की बसाहट बीस से चालीस प्रतिशत तक है. भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोग इस जाट बहुल इलाक़े को ‘मिनी पाकिस्तान’ भी कहते हैं.

मुज़फ्फ़रनगर दंगे के बाद हुए पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां ज़बरदस्त कामयाबी मिली थी. पुरानी कहानी दोहराने के लालच में भाजपा के कुछ नेताओं ने कोशिश तो पूरी की, लेकिन हिंदू कार्ड नहीं चला.

लग रहा है कि जाट बिदककर वापस अपनी बिरादरी यानी चौधरी अजित सिंह की ओर घूम गया है. इससे ज़्यादातर सीटों पर मुक़ाबला चौकोना हो गया है.

उस समय जाटों के भगवा रंग में रंग जाने के कारण अजित सिंह ख़ुद पिछला चुनाव हार गए थे.लेकिन इस बार चौधरी चरण सिंह की स्मृति के सहारे बिरादरी के नेता के रूप में उनका पुनर्जन्म होना तय लग रहा है. यहां कहा जाता है कि चौधरी चरण सिंह चुनाव के वक़्त बूढ़ों के सपनों में आकर उन्हें बेटे का ख़्याल रखने की ताक़ीद कर जाते हैं.

बीबीसी हिंदी पर बरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव के अनुसार मुज़फ्फ़रनगर ज़िले की बुढ़ाना विधानसभा में फुगाना गठवाला (मलिक) खाप का गांव है. यहां पिछले विधानसभा चुनाव के समय 8,000 वोटर थे. अब 6,500 वोटर ही हैं.

यहां से दंगे में 400 से अधिक मुसलमान परिवार पलायन कर गए, जो आज तक लौटे नहीं है. इस गांव में भी हिंदुत्व नहीं, पड़ोस के हरियाणा में भाजपा की खट्टर सरकार के ख़िलाफ़ चल रहा आरक्षण आंदोलन सबसे बड़ा मुद्दा है. इस कारण जाटों का रुझान भाजपा के ख़िलाफ़ दिख रहा है.

‘लिटमस टेस्ट’ वाली दूसरी जगह शामली ज़िले की कैराना विधानसभा है, जहां मुसलमानों के डर से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा भाजपा उठाती रही है.

इस मुद्दे के पैरोकार भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह यहां उम्मीदवार हैं. इस मुद्दे की हवा हुकुम सिंह के ही भतीजे अनिल चौहान ने निकाल दी है.

वे भाजपा से ठुकराए जाने के बाद अजित सिंह की पार्टी रालोद से उम्मीदवार हैं. वह पिछला चुनाव मामूली अंतर से सपा से हार गए थे.

अनिल बताते हैं कि पलायन का मुद्दा बेटी को विधानसभा में पहुंचाने के लिए सियासी कारणों से उठाया गया है, वरना रोजगार की तलाश में हिंदू-मुसलमान दोनों यहां से बाहर जा रहे हैं.

अपराध की घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देना ठीक नहीं, क्योंकि अपराधी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते.

तीसरी जगह बीफ़ कांड के लिए कुख्यात दादरी का राजपूत बहुल बिसाहड़ा गांव है. यहां बसपा, भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच वोटों का बंटवारा धर्म नहीं जाति के आधार पर हो रहा है.

बीफ़ कांड में मारे गए अख़लाक का कोई नामलेवा नहीं है, हालांकि भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यांत्रिक बूचड़खानों को बंद कराने का वादा किया है.

यहां बताया जा रहा है कि बीफ़ कांड के बाद भी कई ग़रीब मुसलमान लड़कियों की शादियां पुराने रिवाज के मुताबिक़ हिंदुओं के सहयोग से हुई हैं.

इस इलाक़े में भाजपा ने अपना आक्रामक चुनाव अभियान ‘बेटियों की इज्जत’, लव जिहाद, ट्रिपल तलाक, मुग़लों के अत्याचार का बदला जैसे उन्हीं मसलों पर फ़ोकस कर रखा था.

ये मुद्दे पिछले लोकसभा चुनाव में सतह पर थे, लेकिन इस बार जाटों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

जाट इस बात से नाराज़ हैं कि भाजपा ने उनके वोट तो ले लिए, लेकिन मोदी की सरकार में वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं दिया. सबसे बड़ा पछतावा यही है कि भाजपा के साथ जाने से उनकी अलग पहचान ही गुम हो गई.

भाजपा ने आरक्षण के मसले पर कोर्ट में उनकी पैरवी नहीं की, विधानसभा में बिरादरी को अनुपात के हिसाब से कम टिकट दिए.

मामला ढीला देख कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बीती आठ फ़रवरी को जाट खापों के नेताओं को केंद्रीय मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह के घर जुटाया था.

जाटों का कहना है कि अमित शाह ने उनसे हेकड़ी से बात की. उन्होंने कहा, आप भाजपा को नहीं तो किसे….चौधरी अजित सिंह को वोट दोगे? वो 25-30 सीटें पाकर मुख्यमंत्री तो बन नहीं जाएंगे!. अंततः आपके वोटों का सौदा सपा-कांग्रेस गठबंधन से कर लेंगे.

इससे नाराज़ खापों के नेता उठकर चले आए. उस बैठक के बाद कई जाट नेताओं को पश्चिमी यूपी में लगाया गया है, ताकि दूसरे चरण में 15 फरवरी को 67 सीटों पर होने वाले मतदान से पहले नुक़सान की भरपाई की जा सके.

इस इलाक़े में जाटव बसपा के साथ जाएंगे, जाट चौधरी अजित सिंह और सपा-कांग्रेस के माफिक उम्मीदवारों के बीच बंटेंगे.

ऐसे में मुसलमान अपनी भारी संख्या के कारण चुनाव का फ़ैसला करने की स्थिति में हैं. मुजफ्फरनगर दंगे ने पुराने जाट-मुस्लिम समीकरण को तोड़कर सामाजिक ताने-बाने को हिला दिया था.

इस कारण मुसलमान पहले की तरह मुखर नहीं है, लेकिन उनमें आख़िरी दम तक असमंजस दिखाई दिया कि वे सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा के बीच किस तरफ जाएं.

यह दुविधा ख़ास कर उन सीटों पर अधिक है, जहां सपा और बसपा दोनों ने मुसलमान प्रत्याशी उतारे हैं. चुनाव प्रचार बंद होने के बाद भी उनकी तंजीमों की बैठकें चलती रहीं थीं. सबसे बड़ा सवाल था कि भाजपा को हराने की हैसियत में कौन है.

पिछले विधानसभा चुनाव में यहां सपा 24 और बसपा 23 सीटें पाकर लगभग बराबरी पर थीं. भाजपा को 12 सीटें और रालोद-कांग्रेस गठबंधन को 14 सीटें मिली थीं.

इस बार सपा-कांग्रेस का गठबंधन है. अकेले प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की रणनीति की सबसे बड़ी चूक यह थी कि वह जाटों का बदला मिजाज भांप नहीं पाई.

भाजपा धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में इतना आगे निकल गई है कि वह अब इतने कम समय में कोई दूसरा मुद्दा नहीं ला पाएगी.

इसका असर दूसरे चरण के चुनाव पर पड़ना तय है, क्योंकि उन विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी का अनुपात इससे कहीं ज्यादा है.

साभार 



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