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दरकने लगा उत्तर प्रदेश सेतु निगम

लखनऊ। अपनी उत्कृष्टता और बेहतरीन निर्माण के लिए देश-विदेश तक अपना डंका बजाने वाले उत्तर प्रदेश सेतु निगम के पास अब यूपी से बाहर कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के भीतर बड़े पुल एवं फ्लाइओवर के डिजाइन एवं निर्माण के लिए जब सेतु निगम को स्थापित किया था, तो शायद उसे भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह निर्माण संस्थान राज्य के बाहर भी अपनी पहचान स्थापित करेगा.

उत्तर प्रदेश सेतु निगम को स्थापित हुए चार दशक से ज्यादा बीत चुके हैं. उम्र के लिहाज से यह संस्थान अब पूरी तरह जवान हो चुका है, लेकिन इतने वर्षों के अनुभव के बाद अब सेतु निगम पर बुढ़ापा हावी होता जा रहा है. इस संस्थान की साख लगातार गिरती जा रही है, जिसका प्रमाण है कि सेतु निगम के कार्य विदेश में कौन कहे, देश के भीतर ही इसे बड़े प्रोजेक्ट हासिल नहीं हो पा रहे हैं. यूपी सेतु निगम प्रदेश के सेतु निर्माण कार्यों तक ही सिमट कर रह गया है. सेतु निगम की कार्य क्षमता तो घट रही है गुणवत्ता और विश्वसनीयता भी पहले से कम हुई है. उच्चस्तरीय इंजीनियरों की संस्थान में लगातार कमी होती जा रही है. खाली पदों को भरने की बजाय संविदा के जरिए काम नहीं कराया जा रहा बल्कि खेल किया जा रहा है. इसका सीधा असर सेतु निगम की क्षमता पर पड़ा है.

दो दशक से विदेशों में नहीं मिला काम

अपने स्थापना के बाद से इराक, नेपाल समेत कई देशों में निर्माण कार्य का झंडा गाडऩे वाले सेतु निगम के पास आज विदेश में कोई काम नहीं है. सेतु निगम द्वारा राज्य में भले ही निर्माण कार्यों की बड़ी-बड़ी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा जा रहा हो, लेकिन पिछले दो दशक से सेतु निगम के पास ओवरसीज में किसी भी परियोजना का ठेका नहीं है.सेतु निगम ने विदेश में अपनी आखिरी प्रोजेक्ट के रूप में सन 1995 में रिपब्लिक ऑफ यमन में 95 मिलियन रुपए की हेराड ब्रिज परियोजना का निर्माण कार्य किया था. इसके बाद से यूपी सेतु निगम को विदेश में एक भी पुल या फ्लाइओवर के परियोजना के निर्माण का काम नहीं मिला है.

सेतु निगम ने अपने स्वर्णिम काल में सबसे ज्यादा काम इराक और नेपाल में किया है. इन दोनों देशों ने यूपी सेतु निगम को अपनी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं के निर्माण का काम दिया. खासकर इराक में दर्जनों प्रोजेक्ट बनाने का सौभाग्य यूपी सेतु निगम को मिला, लेकिन अब यह देश सेतु निगम को प्रोजेक्ट देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. नेपाल में सेतु निगम ने अपने आखिरी प्राजेक्ट के रूप में सिरसिया ब्रिज का काम 1995 में पूरा किया था. जबकि इराक में 25 मिलियन रुपए की लागत से बना दियाला ब्रिज यूपी सेतु निगम का यहां पर आखिरी प्रोजेक्ट था.यह काम सेतु निगम ने 1987 में पूरा किया था. इसके बाद इन दोनों देशों से सेतु निगम का किसी भी प्रोजेक्ट के लिए करार नहीं हुआ. इसकी तस्दीक यूपी सेतु निगम की वेबसाइट खुद करती है.

अगर विदेशों में सेतु निगम के निर्माण की सूची देखें तो इराक के जलावला में वर्ष 1981 में निगम ने दिवाला (45 मिलियन) और माइनर ब्रिज (19 मिलियन) बनाया था। इसके बाद वर्ष 1982 में ओवर पास ब्रिज (85 मिलियन) और फाइव ब्रिजेज (65 मिलियन) का निर्माण हुआ। इसी साल ग्रेटर जैब ओवयर में 150 मिलियन और 120 मिलियन की लागत वाला तिगरीश ब्रिज का निर्माण कार्य निगम ने किया था. इसी तरह 1983 में 130 मिलियन का फोर ब्रिज और 52 मिलियन का मैदान-ए-सुलेमानिया सेतु का निर्माण निगम ने किया था.निगम ने 1984 से 1987 के बीच इराक में कुल नौ परियोजनाओं को पूरा किया, जिसमें 282 मिलियन रुपए की लागत से इसकिकालक मोसुल में बना ग्रेट जब ब्रिज भी शामिल है.सेतु निमग ने नेपाल में भी 1986 से 1995 के बीच कुल दस छोटी-बड़ी परियोजनाओं को पूरा किया, जिसमें 100 मिलियन रुपए की लागत से नेपालीगंज में बना करनाली ब्रिज भी शामिल है.

सेतु निगम में दक्ष कर्मचारियों की भारी कमी

यूपी सेतु निगम की साख पर असर पड़ा है और गुणवत्ता घटी है तो इसका सबसे बड़ा कारण है अधिकारियों-कर्मचारियों की बड़ी कमी. यूपी के स्थानिक भूगोल को बदलने तथा प्रदेशवासियों के जीवन में बड़ा बदलावा लाने वाला सेतु निगम खुद कमजोर हो चुका है. अगर आधिकारिक सूत्रों की माने तो सेतु निगम में कम से कम पचास फीसदी अधिकारियों-कर्मचारियों की कमी है. इसका प्रमुख कारण है कि सेतु निगम के निर्माण के दौर मेंं हुई भर्तियों के लंबे अंतराल के चलते अधिकारी-कर्मचारी लगातार रिटायर होते चले गए, जबकि उनकी जगह भरने के लिए नियुक्तियां नहीं की जा सकीं.

पिछले एक दशक से सेतु निगम में कोई भी भर्ती नहीं हुई है. इसके चलते सेतु निगम की क्षमता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रही है. विभागीय अधिकारियों का कहना है कि सेतु निगम के पास काम की कोई कमी नहीं है. देश-विदेश में हम इसलिए काम नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि अब हमारे पास संख्या बल कम है. टैलेंटेड इंजीनियरों का अभाव है.जो इंजीनियर थे, वे लगातार रिटायर होते चले गए, जबकि उनकी जगह नए इंजीनियरों की भर्ती नहीं हो पाई. विभागीय अधिकारी बताते हैं कि रिटायरमेंट के अलावा सेतु निगम के कर्मचारी इस्तीफा देकर अच्छे और बेहतर पैकेज पर प्राइवेट इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों से जुड़ गए. कर्मचारियों की कमी के चलते सेतु निगम का काम प्रभावित हो रहा है.

एक दशक ने नहीं हुई एक भी भर्ती

उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2013 में सीधी भर्ती पर लगा प्रतिबंध हटाते हुए सेतु निगम में पौने दो सौ पद भरे जाने की मंजूरी दे दी थी, लेकिन पता नहीं किस कारण परीक्षा तिथि के दो दिन पहले इन नियुक्तियों को रोक दिया गया. आज तक इन नियुक्तियों को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है. वर्ष 2005 से ही सेतु निगम के सीधी भर्ती पर रोक लगी थी, जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार ने वर्ष 2013 में हटा लिया था. शासन ने पौने दो सौ पद भरे जाने के लिए मंजूरी भी दे दी थी. इसमें सहायक अभियंता सिविल के 28, सहायक अभियंता यांत्रिक के 7, अवर अभियंता सिविल के 96, कंपनी सचिव का 1, वरिष्ठ लेखाधिकारी के 3, लेखा लिपिक के 10, कार्यालय सहायक ग्रेड 2 के 14 और आशुलिपिक के 16 पद शामिल थे. सेतु निगम ने भर्ती परीक्षा कराने के लिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी को लगभग 34 लाख रुपए का भुगतान भी किया जा चुका था, लेकिन परीक्षा तिथि से कुछ दिन पूर्व ही सारी प्रक्रिया रोक दी गई. अब इसे किन कारणों से रोका गया तथा उक्त धनराशि को किस मद में दिखाया गया है, इसकी जानकारी नहीं मिल पा रही है. सेतु निगम के जीएम हेडक्वार्टर एसी श्रीवास्तव कहते हैं कि जल्द ही सेतु निगम में भर्तियां शुरू की जाएंगी.

रिटायरमेंट के बाद संविदा पर रखे जा रहे विभागीय कर्मी

सेतु निगम में कर्मचारियों की कमी को कारण बताते हुए वरिष्ठï अधिकारी सेवानिवृत्त होने वाले कुछ कर्मचारियों को संविदा पर रखकर निगम के कामों का संचालन करा रहे हैं.सेतु निगम कर्मचारी महासंघ ऐसी भर्तियों का लंबे समय से विरोध करता आ रहा है. महासंघ का आरोप है कि निगम के वरिष्ठ अधिकारी पिक एंड चूज की तर्ज पर अपने चहेतों को रिटायरमेंट के बाद रख रहे हैं. ऐसे कर्मचारियों से मनमाने ढंग से काम लिया जाता है और मनमाने तरीके से पेमेंट करके खेल किया जा रहा है.

संघ के अध्यक्ष इशरत जाह साफ कहते हैं कि कर्मचारियों को संविदा पर रखकर काम लेने की बजाय नई भर्तियां की जाएं. आखिर जब पैसे खर्च किए जा रहे हैं तो नए लोग को भर्ती करने में क्या दिक्कत है. सेतु निगम के एमडी सलेक चंद्र सभी आरोपों को नकारते हुए कहते हैं कि स्टॉफ की कमी है.सेतु निगम के पास अभी 250 से ज्यादा सेतुओं का काम है. दक्ष इंजीनियर मिल नहींं रहे, ऐसे में हम रिटायरमेंट के बाद सक्षम लोगों को संविदा पर रख रहे हैं, जिन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है. प्रोजेक्ट समय से पूरे करने हैं तो कुछ ना कुछ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे.

टर्न ओवर 1500 करोड़ पहुंचाने में जुटा सेतु निगम

आजादी के लगभग ढाई दशक बाद जब राज्य में निर्माण कार्य की जरूरतें बढऩे लगीं, पुलों-सेतुओं का निर्माण आवश्यक होने लगा तो राज्य सरकार ने लोक निर्माण विभाग से अलग करके मार्च 1973 उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम की स्थापना कर डाली. इस निगम की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि लोक निर्माण विभाग अगर सड़कों का जाल बिछाए तो उतने ही समय में सेतु निगम रास्ते में आवश्यकतानुसार पडऩे वाले पुलों-सेतुओं का निर्माण कम समय में कर सके. शुरुआती दौर में छोटे पूंजी निवेश से शुरू हुआ सेतु निगम अब बड़े टर्नओवर की तरफ बढ़ रहा है. वर्ष 2007 में सेतु निगम का सालाना टर्न ओवर 400 करोड़ रुपए था, जो बढ़कर 1000 करोड़ से ज्यादा का हो चुका है. सेतु निगम अब अपने टर्न ओवर को 1500 करोड़ रुपए तक पहुंचाने की दिशा में क्रियाशील है. सेतु निगम के प्रबंध निदेशक सलेक चंद्र कहते हैं कि सेतु निगम अब अपने टर्न ओवर को 1500 करोड़ रुपए तक पहुंचाने की दिशा में प्रयासरत है.

स्वीकृत न होने के बावजूद बाहरी संस्था को दिया निर्माण का ठेका

यूपी सेतु निगम की पहचान और साख में बट्टा  लगाने का काम उसके अधिकारी ही करते रहते हैं. आर्थिक लूट को अंजाम देने के लिए जमकर खेल किया जाता है. बलिया जिले में गंगा नदी पर बनने वाले पुल को शासन ने तकनीकी कारणों से रोक दिया, लेकिन सेतु निगम ने अधिकारी शासन से सहमति मिलने पूर्व ही 20 करोड़ रुपए से ज्यादा की धनराशि कार्यदायी कंपनी को अवमुक्त कर दिया. बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में कमीशनखोरी का मामला जुड़ा था. अब पेंच फंस गया है तो स्थानीय स्तर के अधिकारी अपने बचाव का रास्ता ढूंढ रहे हैं.

बलिया में एनएच -1 से शिवपुर दियरा नंबरी मार्ग के श्रीरामपुर घाट पर गंगा नदी पुल बनाए जाने का प्रस्ताव था. सेतु निगम ने इसका आगणन किया तथा लोक निर्माण विभाग को इसका प्रस्ताव भेज दिया. तकनीकी कारणों से लोक निर्माण विभाग ने स्टीमेट स्वीकृत नहीं किया. सेतु निगम के तत्कालीन  एमडी सलेक चंद्र ने भी मुख्य अभियंता सेतु वाईके गुप्ता द्वारा पुल के पुनरीक्षित आगणन हेतु भेजे गए पत्र के जवाब में उक्त कार्य पर किसी भी प्रकार के दायित्व सृजित न करने का निर्देश दिया. एमडी के आदेश के बावजूद सेतु निगम के स्थानीय विंग के अधिकारी उक्त सेतु के निर्माण के लिए बाहरी संस्था एटईपीएल-एसपीएसपीएल जेवी बलिया से सेतु निर्माण का करार कर लिया तथा उसे अग्रिम भुगतान के रूप में बीस करोड़ रुपए भी अवमुक्त कर दिए. इसके अतिरिक्त भी अन्य खर्चों के लिए लगभग पांच करोड़ रुपए अतिरिक्त दिए गए. सवाल यह उठता है कि सेतु निर्माण कार्य में सक्षम निगम ने क्यों पुल निर्माण का काम बाहरी संस्था को सौंपा तथा एमडी के मनाही आदेश के बावजूद उक्त संस्था को अग्रिम धनराशि दे दी गई. किस मद से दी गई यह भी बड़ा सवाल है? दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी बड़ा सवाल है.

गड़बड़ी करने वाले इंजीनियर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं

सेतु निगम के अधिकारियों का खेल यही खत्म नहीं होता है. यहां एक इंजीनियर के मनमाने रवैये से करोड़ों रुपए का पुल निस्प्रयोज्य हो चुका है, लेकिन जिम्मेदार इंजीनियर पर कोई कठोर कार्रवाई अब तक नहीं हुई है.जांच के फाइलों में कार्रवाई उलझी हुई है. दरअसल, मामला लखीमपुर खीरी जिले से जुड़ा हुआ है. वर्ष 2008 में नौवापुर-मुढिया नकहा मार्ग के किमी 6 पर चौका नदी 79.40 मीटर लंबाई का एक पुल नाबार्ड -14 के अंतर्गत स्वीकृत किया गया था. सेतु निगम की टीम ने तीन स्थानों का संरेखण जांचने के बाद नकहा-मुढिय़ा मार्ग को जोडऩे वाले रास्ते पर पुल के निर्माण के लिए प्रस्तावित किया, लेकिन उक्त निर्माण की जिम्मेदारी संभालने वाले उप परियोजना प्रबंधक सेतु निगम लखीमपुर खीरी एचके वर्मा ने सभी नियमों धत्ता बताकर अपनी मनमर्जी से दूसरी जगह पुल का निर्माण शुरू करा दिया.

विभागीय इंजीनियरों, तत्कालीन जिलाधिकारी के मनाही के बावजूद 346.56 लाख रुपए की लागत से बनने वाले पुल का निर्माण अपनी मर्जी वाले स्थान पर करा दिया। विभागीय इंजीनियरों ने पहले ही उक्त पुल के अनुपयोगी होने की आशंका जताई जो बाद में सही साबित हुई.इसके अलावा एचके वर्मा पर सैलरी बढ़ाने को लेकर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप भी सामने आए. इन आरोपों पर एचके वर्मा के खिलाफ जांच कराई गई, जो सही पाई गई. इसके बाद इन्हें मुरादाबाद से हटाकर मुख्यालय संबद्ध कर दिया गया, लेकिन अब तक कोई अनुशासनात्मक कठोर कार्रवाई नहीं की गई है.

 



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