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नदियों के तट पर माफियाओं की सत्ता

नदियों के तट पर खनन माफियाओं की समानान्तर सत्ता चलती है। यहां न तो पुलिस की चलती है और न ही खनन विभाग के अधिकारियों की। रात के वक्त जब घरों की रोशनी बंद हो जाती है तब नदियों के तट तेज रोशनी वाले हैलोजन से जगमगाते हैं। रही बात दोष मढ़ने की तो नदियों के तट से अवैध खनन के काले खेल को लेकर किसी एक सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अब तक जितनी भी सरकारों ने प्रदेश की सत्ता का लुत्फ उठाया, लगभग सभी के कार्यकाल में नदियों की छाती चीरकर बालू-मौरंग अवैध तरीके से निकाली जाती रही है। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेश हैं कि नदियों में पोकलैन मशीनों का उपयोग नहीं किया जायेगा, लेकिन खनन माफियाओं के बुलन्द हौंसले न्यायपालिका के आदेशों की भी परवाह नहीं करते। पोकलैन मशीनों की खास बात यह है कि यह मशीनें नदियों में मौजूद बालू और मौरंग की एक-एक कण तक निकाल लेती हैं। यहां तक कि नदियों की मिट्टी तक इन मशीनों से निकल आती है।

सैफ उल्लाह खान

खनन मंत्री की स्वीकारोक्ति और मुख्यमंत्री के तमाम दावों के बावजूद सूबे की औद्योगिक नगरी कानपुर स्थित गंगा तट से अवैध खनन का धंधा खूब फल-फूल रहा है। हाल ही में कानपुर के गुरुसहायगंज में स्थानीय पुलिस, लेखपाल और खनन माफियाओं की मिलीभगत से अवैध खनन के बाबत शिकायत भी की जा चुकी है। चश्मदीद गवाह के रूप में स्थानीय निवासी मौजूद हैं, लेकिन मजाल है कि स्थानीय प्रशासन की सरपरस्ती में सांस ले रहे खनन माफियाओं केा कोई छू भर पाए। अवैध खनन की जानकारी जिलाधिकारी को भी है लेकिन खादीधारियों की घुड़की कार्रवाई में बाधा बनकर खड़ी है। इतना ही नहीं कानपुर जनपद के ही विधनू थाना क्षेत्र में आने वाला उरियारा, उरछी, रमईपुर, जामु, बाजपुर हाजीपुर सहित दर्जनों गांवों में स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से खनन का अवैध धंधा अपने चरम पर है।

जिलाधिकारी कहते हैं कि स्थानीय पुलिस को सख्त आदेश दिए जा चुके हैं कि अवैध खनन करने वालों के साथ सख्ती बरती जाए। स्थानीय लेखपालों को भी नजर रखने के आदेश दिए जा चुके हैं। इलाकों की स्थानीय पुलिस नेताओं की धमकी के आगे बेबसी का रोना रो रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि नेताओं और अधिकारियों की घुड़की तो महज बहाना मात्र है जबकि सच्चाई यही है कि लेखपाल और स्थानीय पुलिस के साथ खनन माफियाओं की तिकड़ी  खनन के इस काले खेल में शामिल है। बेखौफ खनन माफियाओं की भी सुन लीजए, ‘अवैध खनन के एवज में स्थानीय प्रशासन को हम लोग मोटी रकम नियमित रूप से पहुंचाते हैं। यह अलग बात है कि हाल-फिलहाल खनन पर रोक लगी हुई है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि यदि खनन नहीं हुआ तो प्रदेश के विकास कार्य रूक जायंेगे। आम जनता को भी परेशानी होगी। वह अपना घर तक नहीं बनवा पायेगी।’ खनन माफिया के यह बोल कितने सच्चे हैं? यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन जिस तरह से कुछ समय पूर्व खनन मंत्री ने स्वयं अवैध खनन की पोल खोली थी, उससे इतना जरूर साबित हो जाता है कि यूपी की औद्योगिक नगरी कानपुर स्थिति गंगा के तटों पर ही नहीं बल्कि पूरे सूबे में अवैध खनन का काला कारोबार खूब फल-फूल रहा है और वह भी सत्ताधारियों की जानकारी में।

ऐसा ही एक मामला घाटमपुर तहसील के सजेती थाना क्षेत्र में संज्ञान में आया। गांव में रात भर दर्जन भर ट्रैक्टरों और जेसीबी मशीनों से अवैध खनन होता रहा। गांव के कुछ साहसी लोगों ने मोबाईल से जिलाधिकारी को फोन कर सूचना दी। जिलाधिकारी ने भी मामले को तत्काल संज्ञान में लिया और उप जिलाधिकारी को कार्रवाई के आदेश दिए। अवैध खनन की सूचना जैसे ही उप जिलाधिकारी घाटमपुर को मिली उन्होंने तत्काल पुलिस को मौके पर भेजा। जिलाधिकारी ने रिपोर्ट तलब की तो कहा गया कि खनन करने वाले पुलिस के पहुंचने से पहले ही फरार हो गए थे। हास्यासपद पहलू यह है कि पुलिस ने टैक्टर से बालू भरकर ले जा रहे टैक्टरों की खोज-खबर तक नहीं ली। सिर्फ फरारी की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। हैरत की बात है कि जिलाधिकारी ने भी पुलिस की कहानी पर विश्वास कर मामले को ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया।

अवैध खनन में होने वाले फायदे का अर्थशास्त्र भी जान लीजिए। वैध तरीके से एक 10 टायर वाले ट्रक में 650 से 800 फुट तक मौरंग भरकर कानपुर से राजधानी लखनऊ (लगभग 85 से 90 किलोमीटर की दूरी) लाने मेें लोडिंग का खर्च तकरीबन 4 हजार रुपए तक आता है। इसमें पट्टाधारकों को मिलने वाली राॅयल्टी 10 हजार रुपए होती है। परिवहन में होने वाला खर्च लगभग 3 हजार रुपए। एंट्री शुल्क के नाम पर 2 हजार तक की अवैध वसूली होती है। कुल मिलाकर 20 हजार रुपए का खर्च एक चक्कर में आता है। मौरंग की वर्तमान कीमत 25 हजार से 28 हजार प्रति ट्रक के आस-पास है। इस तरह से प्रति ट्रक 5 से 8 हजार रुपए तक बच जाते हैं। अब देखिए अवैध ढंग से 10 टायर वाले एक ट्रक से होने वाला मुनाफा। लोडिंग में आने वाला खर्च वही 4 हजार आता है। खास बात यह है कि इसमें पट्टाधारकों को जो राॅयल्टी की रकम 10 हजार मिलती थी वह शून्य हो जाती है। परिवहन में होने वाला खर्च भी लगभग उतना ही आता है। एंट्री शुल्क में भी 3 हजार का खर्च आता है। मौरंग की बाजारू कीमत भी यदि वही जोड़ ली जाए तो अवैध खनन के एवज में मिलने वाली राशि 15 से 18 हजार हो जाती है। है न फायदे का धंधा!

क्या कहती है सुप्रीम कोर्ट…

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर आदेश दिया था कि, ‘जिन कारकों से पर्यावरण को नुकसान हो सकता है उन्हें बंद होना चाहिए।’ गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट अवैध खनन के मामलों की जांच सुप्रीम कोर्ट इंक्वायरी टीम से भी करवा सकती है। अवैध खनन और ओवर लोडिंग के खिलाफ बुंदेलखंड पृथक राज्य संघर्ष समिति के संयोजक एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य गंगाचरण राजपूत ने भी कहा था कि                बुंदेलखण्ड ही नहीं पूरे राज्य में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना हो रही है। प्रतिबन्धित भारी-भरकम पोकलैन मशीनों से अवैध खनन किया जा रहा है। यह तब हो रहा है जब नदी की जलधारा के भीतर से हो रहे खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है। सुप्रीम कोर्ट ने नदी की धारा में तीन मीटर से ज्यादा गहरा गड्ढा करने पर रोक लगा रखी है लेकिन खनन माफियाओं पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का कोई प्रभाव नजर नहीं आता। बालू माफिया निर्धारित मात्रा से कहीं अधिक खनन कर रहे हैं।

खनिज नीति में हुआ था संशोधन

लगभग दो वर्ष पूर्व सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खनन के खेल का अर्थशास्त्र शायद सीख लिया था, यही वजह थी कि मुख्यमंत्री ने खनिज से मिलने वाले रायल्टी से क्षेत्र के विकास दावा किया और खनिज नीति में संशोधन पर भी दबाव बनाया। खनिज नियामावली 2014 में यह व्यवस्था की गई है कि खनिज रायल्टी से प्राप्त धन में से अब 50 फीसदी उसी क्षेत्र के विकास में खर्च किया जायेगा, जिस जनपद-स्थान से खनन किया जा रहा है। पट्टा धारकों का चयन टेंडर प्रक्रिया से कराये जाने की बात कही गयी थी। इससे पूर्व जिम्मेदारी जिलाधिकारी की होती थी। वह जिसे चाहे खनन का पट्टा दे सकता था। जिलाधिकारी का सीधा सम्बन्ध सूबे के खनन मंत्री से होता था। खनन मंत्री पार्टी मुखिया को विश्वास में लेकर खेल को उच्च स्तर पर खेलता था। खनन की कमाई का अधिकतर हिस्सा पार्टी फण्ड में जाता था। नयी नियमावली यदि लागू हो जाए तो अवैध कमाई के अधिकतर रास्ते बंद हो जायेंगे। जो ज्यादा बोली लगायेगा, उसी को पट्टा मिलेगा। सारा कुछ ‘डायेक्टर आॅफ जियोलॉजी एण्ड माइनिंग, यूपी’ की वेबसाइट में नजर आयेगा। इससे पहले कि सरकार की यह नीति अपने मुकाम पर पहुंचती, खनन माफिया से जुडे़ लोग कोर्ट पहुंच गए। परिणामस्वरूप वर्तमान समय तक नयी खनन नीति को लागू नहीं किया जा सका।

कोई खौफ नहीं!

जिस वक्त लोग अपने घरों में गहरी नींद में सो रहे होते हैं उस वक्त गंगा के तट बल्ब और बड़े-बड़े हैलोजन से रोशन होते हैं। यह जगमगाहट किसी पर्व को लेकर नहीं बल्कि अवैध खनन के लिए होती है। रात भर बालू और मौरंग भरे भारी भरकम ट्रक सड़कों को रौंदते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। रात्रि ड्यूटी पर पुलिस पिकेट भी मौजूद रहती है, मजाल है कि कोई पुलिस वाला ट्रकों को रोकने की हिम्मत भी कर सके। अक्सर ट्रक चालक और उसके सहयोगियों के साथ पुलिस कर्मियों को हंसी-मजाक करते आसानी से देखा जा सकता है। साफ जाहिर है कि पर्दे के पीछे सारा खेल पूरी सहमति से चल रहा है और मीडिया के सामने जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई का दावा कर रहे हैं। गौरतलब है कि हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अवैध खनन में लापरवाही बरतने पर इलाहाबाद के कमिश्नर वीके सिंह और फतेपुर के डीएम राकेश कुमार को सस्पेंड किया था। इसके बावजूद जिस तरीके से अवैध खनन का काला खेल चल रहा है उससे कहीं से यह नहीं लगता कि खनन माफियाओं में कोई डर नाम की चीज भी है।
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