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ब्रांड इमेज से बड़े नेता बन सकते हैं अखिलेश,मिल सकता है कांग्रेस,लोकदल,जदयू का साथ




समाजवादी पार्टी अंतत: टूट गई. अब सवाल यह है कि पार्टी और अखिलेश का भविष्य क्या होगा?

लखनऊ .राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश के सिद्धांतो का अनुसरण करने का ढिढोरा पीटने वाली समाजवादी पार्टी आख़िरकार दो खंडो में बट गई .आज से कुछ माह पूर्व पार्टी और परिवार में मुलायम की राजनैतिक बिरासत का वारिश बनने की जंग ने कल पार्टी को तोड़ दिया .मुलायम के पुराने दोस्तों ने उगते सूरज को सलाम करते हुए अखिलेश का साथ पकड़ नेता जी को अलबिदा कह दिया है ,कल मुलायम सिंह यादव द्वरा अखिलेश को पार्टी से निष्कासन की घोषणा के बाद से ही समाजवादी पार्टी में भूचाल सा आ गया .पार्टी में इस्तीफे का दौर चल रहा है तो कोई आत्मदाह कर रहा है. अब सवाल उठना लाजमी है कि पार्टी और अखिलेश का भविष्य क्या होगा? अखिलेश मुख्यमंत्री रहेंगे या प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगेगा? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रहेगा? क्या अखिलेश यादव कांग्रेस सहित अन्य दलों के साथ गठबंधन करेंगे?

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी में पहले नेता हैं जिनका यादव तबके के बाहर भी अच्छा जनाधार है. उनकी छवि साफ-सुथरी है, उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है. नई पीढ़ी के एक तबके में उनको जबरदस्त समर्थन हासिल है.अगर अखिलेश यादव की तरफ दो से तीन प्रतिशत युवा भी जाते हैं तो फिलहाल मजबूत स्थिति में चल रही भाजपा की हालत कमजोर पड़ेगी, क्योंकि भाजपा का मुख्य फोकस युवा ही हैं जिनके दम पर वह चुनाव जीतने का भरोसा रखती है.
समाजवादी पार्टी में इस घमासान के बाद मुस्लिम मतदाताओं की शरणगाह बहुजन संमाज पार्टी बन रही है . वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में बसपा की तरफ जा सकते हैं. इस बार उत्तर प्रदेश में जिस तरह की स्थितियां बन रही हैं, उसमें बसपा को अगर एकमुश्त मुस्लिम वोट मिलते हैं तो मायावती की सत्ता पर वापसी तय मानी जा रही है.

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समाजवादी पार्टी की यह टूट मुलायम और अखिलेश दोनों को कमजोर करेगी. अखिलेश सरकार ने अपेक्षाकृत अच्छा काम किया है . उनकी छवि बेहतर बनी थी. पार्टी अगर संगठित होकर चुनाव लड़ती तो उनके वापसी की भी संभावना बन सकती थी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति के एका एक आए संकट में सबसे पहले यह देखना होगा कि मौजूदा उत्तर प्रदेश सरकार रहती है या राष्ट्रपति शासन लगता है. अगर तत्काल प्रभाव से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है तो अखिलेश के लिए भी स्थिति बहुत कठिन होगी. सत्ता में रहकर वे जैसा प्रदर्शन कर सकते हैं, वह सत्ता से बाहर रहकर संभव नहीं है.



सूत्र बताते है कि कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर पार्टी टूटने के साथ ही अखिलेश यादव के संपर्क में हैं. अगर अखिलेश एक नई पार्टी बनाकर कांग्रेस से गठबंधन करते हैं तब एक स्थिति बन सकती है .
सूत्रों का दावा है अखिलेश के नेतृत्व में कांग्रेस ,लोकदल ,जदयू का संयुक्त महागठबंधन बन सकता है और इस गठबंधन को जनता का समर्थन मिले, जैसा कि बिहार में हुआ था.
फिरहाल प्रदेश की राजनीति किस करवट बैठती है,राजनैतिक कुहासा हटते ही साफ़ होगी.



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