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भ्रष्‍टाचार की सड़क : सवाल पूछता आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे

आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे । एक ऐसा प्रोजेक्‍ट, जिसकी शुरुआत भी विवादों से हुई और अंत भी भ्रष्‍टाचार के कलंक के साथ होने की संभावना बन गई है। कारण सीधा है, पहला नवनीत सहगल जैसा विवादित एवं दागी अधिकारी इसकी जिम्‍मेदारी संभाल रहा है और दूसरा कि जिस छह लेन हाइवे को केंद्र सरकार की एनएचआई 17 से 18 करोड़ प्रति किमी की लागत में तैयार करा लेती है, उसे उत्‍तर प्रदेश की सरकार अनुमानत: 30 करोड़ प्रति किमी के हिसाब से बनवा रही है। यह भी ध्‍यान देने वाली बात है कि यह प्रोजेक्‍ट मुख्‍यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्‍ट भी है और सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि भी।

सरकार इस एक्‍सप्रेस हाइवे को लेकर चुनाव से पहले जमकर ढोल पीट रही है। प्रचार कर रही है, लेकिन पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह और अब भाजपा के दिग्‍गज नेता एवं प्रवक्‍ता आईपी सिंह ने भी इस एक्‍सप्रेस-वे की लागत को लेकर सवाल उठाया है। उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार का सीधा आरोप मुख्‍यमंत्री और आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल पर जड़ा है। आईपी सिंह के आरोपों को इसलिए भी बल मिल रहा है कि उन्‍होंने यूपी एक्‍सप्रेस-वे इंडस्‍ट्रीयल डेवलपमेंट अथारिटी यानी यूपीडा से आरटीआई के जरिए जो जानकारी मांगी थी, उन्‍हें पूरी जानकारी नहीं दी गई। बकौल आईपी सिंह, ‘आगरा एक्‍सप्रेस वे बनवाने के नाम पर मुख्‍यमंत्री और नवनीत सहगल द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई की हजारों करोड़ की लूट-खसोट हो रही है।’ उन्‍होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे के निर्माण की जांच सीबीआई और कैग से कराए जाने की मांग की है।

दरअसल, भाजपा नेता आईपी सिंह के आरोपों को झुठलाया भी नहीं जा सकता है। इस एक्‍सप्रेस-वे के साकार रूप लेने से पहले ही कई गड़बड़ी सामने आ चुकी है। पहले इस प्रोजेक्‍ट को पीपीपी माडल के जरिए बनवाया जाना था, जिसकी अनुमानित लागत 5000 करोड़ रुपए आंकी गई थी। पीपीपी मोड के तहत 24 मई 2013 को प्री-बिड कांफ्रेंस में 15 कंपनियों से प्रतिभाग किया, जिसमें जीवीके,जीएमआर, एस्‍सेल इंफ्रा, विंसी कन्‍सेसंस, जेपी इंफ्रा, एसआरईआई इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, सुप्रीम, पीएनसी इंफ्राटेक, सोमा, गैमन इंडिया, ल्‍यूटन वेल्‍सपन, आईएल एंड एफएस, यूनिक्‍वेस्‍ट इंफ्रा, ट्रांसट्रॉय और पुंज लायड शामिल थीं। योजना की अनुपयोगिता को देखते हुए किसी भी कंपनी ने इसमें दिलचस्‍पी नहीं दिखाई। परियोजना रिक्‍वेस्‍ट फार प्रपोजल और रिक्‍वेस्‍ट फार क्‍वेरी से आगे नहीं बढ़ पाई। सरकार की दो साल की कोशिशों के बावजूद एक भी निवेशक ने इस परियोजना में पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ, जबकि सरकार ने लैंड पार्सल तथा टोल आमदनी जैसी सुविधाओं का भी प्रस्‍ताव रखा था।

जाहिर था कि इस योजना से किसी को लाभ नजर नहीं आ रहा था। इसका मुख्‍य कारण था कि प्री-बिड बैठक में भाग लेने वाली कंपनियों ने अनुमान लगाया था कि इस रूट पर ट्रैफिक अत्‍यंत कम होगा, क्‍योंकि पहले से ही आगरा जाने के लिए हाइवे मौजूद हैं। किसी भी कंपनी को यूपी सरकार का यह प्रोजेक्‍ट व्‍यवहारिक नहीं लगा तथा लागत की वसूली होने की संभावना भी नजर नहीं आई। इसलिए कोई भी कंपनी इस प्रोजेक्‍ट में निवेश करने को तैयार नहीं हुई, लिहाजा सरकार ने इस प्रोजेक्‍ट को जनता के पैसे से नगद अनुबंध पर पूरा करने का निर्णय लिया, जो राज्‍य की वित्‍तीय हालत को देखते हुए कतई उचित कदम नहीं कहा जा सकता था।

दरअसल, इस प्रोजेक्‍ट की शुरुआत ही कुछ खास जिलों को लाभ पहुंचाने तथा खुद लाभ अर्जित करने के लिए की गई थी। पीपीपी माडल के तहत जिस परियोजना की लागत 5000 करोड़ रुपए आंकी गई थी, यह लागत दिसंबर 2013 तक बढ़कर 8944 करोड़ रुपए हो गई थी। अब यह लागत अनुमानत: 15000 करोड़ रुपए तक बढ़ चुकी है, जिसके पूरा होने तक बढ़कर 20000 करोड़ रुपए तक पहुंच जाने का अनुमान है। 302 किमी लंबे इस एक्‍सप्रेस-वे की शुरुआती लंबाई 270 किमी थी, जिसके जरिए यमुना एक्‍सप्रेस-वे को लिं‍क किया जाना था, लेकिन सैफई को जोड़ने के लिए इसकी लंबाई 32 किमी और बढ़ा दी गई। आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे परिजयोजना को लेकर कई सवाल उठे, जिसमें पहला तो यही था कि जब इस प्रोजेक्‍ट को पीपीपी के जरिए बनाना था तो फिर कैश कांट्रैक्‍ट बेसिस यानी ईपीसी मोड में बनाने का निर्णय किसलिए लिया गया? कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2012 में बने छह लेन के यमुना एक्‍सप्रेस-वे की प्रति किमी पूरी लागत, जिसमें जमीन अधिग्रहण भी शामिल था, 27.20 करोड़ रुपए आई तो आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेव-वे की अनुमानित लागत 50 करोड़ तक कैसे पहुंच गई है?

कार्यदायी कंपनियों के चयन को लेकर भी सवाल खड़े हुए। यूपीडा ने आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे बनाने के लिए पांच भागों में चार कंपनियों का चयन किया, जिसे आगरा-फिरोजाबाद, फिरोजाबाद-इटावा, इटावा-कन्‍नौज, कन्‍नौज-उन्‍नाव तथा उन्‍नाव-लखनऊ के पांच भागों में बांटा गया। आगरा से फिरोजाबाद के गुरहा गांव तक 53.5 किमी एक्‍सप्रेस-वे बनाने की जिम्‍म्‍ेदारी टाटा प्रोजेक्‍टस लिमिटेड को, फिरोजाबाद के गुरहा गांव से इटावा के मूंज गांव तक 62 किमी एफकॉन्‍स इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को, इटावा के मूंज गांव से कन्‍नौज के नरमऊ गांव तक 57 किमी नागार्जुन कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी को, कन्‍नौज के नरमऊ गांव से उन्‍नाव के नेवल गांव तक 64 किमी एफकॉन्‍स इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को तथा उन्‍नाव के नेवल गांव से लखनऊ तक 63 किमी सड़क बनाने की जिम्‍मेदारी लार्सन एंड टब्रो को सौंपी गई। इन कंपनियों के साथ 27 अगस्‍त 2014 को हुए आरएफपी के आधार पर 12 सितंबर 2014 को प्री-बिड मीटिंग आयोजित की गई। इसके बाद बिड की तारीख बढ़ाकर 1 अक्‍टूबर से 21 अक्‍टूबर 2014 एक बजे तक कर दी गई। इस बिड में 24 कंपनियों ने भागीदारी की, लेकिन चुनाव केवल चार कंपनियों का हुआ।

सवाल भी यहीं से शुरू हुआ कि क्‍या इस एक्‍सप्रेस-वे बनाने में प्रतिभाग करने वाली सभी कंपनियों की न्‍यूनतम बिड स्‍वीकार की गई?क्‍या इन कंपनियों ने सभी पांच भागों में भाग लिया? किस आधार पर उपरोक्‍त पांचों कंपनियों को बोली में भाग लेने से रोका गया?बिड में पारदर्शिता ना होने के चलते इस तरह के कई सवाल उठे, लेकिन यूपीडा ने किसी का भी जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। जमीन अधिग्रहण को लेकर भी पूरा खेल हुआ, लेकिन सीएम अखिलेश यादव इस पर अपनी पीठ लगातार ठोंकते रहे। अक्‍सर बसपा सुप्रीमो पर कटाक्ष करते हुए कहते रहे कि यमुना एक्‍सप्रेस-वे के समय तो किसानों से जबरिया जमीन छीनी गई, लेकिन हमें किसानों ने स्‍वेच्‍छा से जमीन दी। हालांकि यह भी मोदी के ‘मन की बात’ टाइप एकतरफा प्रलाप ही रहा, सच्‍चाई इससे जुदा थी। इस परियोजना से 30 हजार से ज्‍यादा किसान प्रभावित हुए। हजारों किसानों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ा। किसी ने स्‍वेच्‍छा से जमीन दी तो किसी को प्रशानिक हनक दिखाते हुए जबरिया जमीन लिखा लिया गया।

एक्‍सप्रेस-वे के चलते 232 राजस्‍व गांव प्रभावित हुए तथा 3,368.60 हेक्‍टेयर भूमि इस योजना के लिए अधिग्रहित की गई, जिसमें 303 हेक्‍टर के आसपास सरकारी भूमि भी शामिल है। इस अधिग्रहण में किसानों की दोफसली और बहुफसली जमीन भी शामिल है। मुख्‍यमंत्री के गृह जनपद इटावा के ही किसानों ने मुआवजा में भेदभाव को लेकर हड़ताल व धरना किया था। उनका आरोप था कि मुआवजा देने में सरकार ने भेदभाव किया है। बकौल रिटायर्ड आईएएस सूर्य प्रताप सिंह, ‘सैफई में 1.20 करोड़ से 1.25 करोड़ रुपए का मुआवजा प्रति हेक्‍टेयर की दर से दिया गया, जबकि इटावा के ही ताखा तहसील के किसानों को 15 से 20 लाख रुपए प्रति हेक्‍टेयर के दर से मुआवजा दिया गया। सैफई के लिए स्‍पेशल रेट तथा विकास प्राधिकरण का बहाना बनाकर प्रति स्‍क्‍वायर मीटर, गज के हिसाब से जमीन का मुआवजा दिया गया।’

किसानों को मुआवजा देने के लिए सरकार की तरफ से 5000 करोड़ रुपए की बजट व्‍यवस्‍था की गई थी। इतना ही नहीं, यूपीडा पर यह भी आरोप लगा कि वह किसानों द्वारा दी गई जमीन से ज्‍यादा जमीन पर कब्‍जा कर रहा है। किसानों ने इसकी शिकायत भी संबंधित विभागों में की, लेकिन किसी की कहीं भी सुनवाई नहीं हुई। उन्‍नाव के ही बांगरमऊ गांव जगटापुर के किसानों ने बैनामा से अधिक जमीन अधिग्रहित किए जाने का आरोप लगाया है। जगटापुर के निवासी आदित्‍य कुमार ने तो सीएम को भी पत्र भेजकर इसकी शिकायत की है। इस गांव के शीलू कटियार, शिवम कटियार, सरोज कटियार, सर्वेश पटेल, अनिल कटियार, रामपाल शर्मा, अमरेश पटेल समेत दर्जनों किसानों की बैनामा से ज्‍यादा भूमि यूपीडा द्वारा अधिग्रहित कर ली गई है। पर, इनकी शिकायतों पर ना कोई कार्रवाई होनी थी, ना हुई।

सोशल साइट फेसबुक पर सूर्य प्रताप सिंह ने लिखते हैं कि 15000 करोड़ रुपए के आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे प्रोजेक्‍ट इटावा, कन्‍नौज के कुछ चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया है। उनका दावा है कि इस एक्‍सप्रेस-वे का ले-आउट प्रोजेक्‍ट का प्‍लान लीक कर दिया गया। कई बार चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए इसे बदला गया। श्री सिंह लिखते हैं कि सत्‍ता पक्ष के नेताओं, दबंगों और नौकरशाह ले-आउट और आसपास की जमीनों को किसानों से सस्‍ते दर पर खरीद लिया। फिर कलेक्‍टर से मनमाफिक सर्किल रेट बढ़वाकर इन जमीनों को चार गुना रेट पर सरकार को दे दिया गया। लखनऊ, उन्‍नाव, कन्‍नौज, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, इटावा, मैनपुरी आदि दस जनपदों में अब तक कुल 27 हजार रजिस्ट्रियां हुई हैं, जिनमें से 15-20 हजार इन्‍हीं लोगों की है। खैर, आरोप तो यहां तक लगे कि कुछ बड़े बिल्‍डरों को भी इस प्‍लान का ले-आउट लिक किया गया ताकि वे मनमाफिक जमीन खरीद सकें, जिसका बाद में महंगे दामों पर कामर्शियल इस्‍तेमाल किया जा सके। श्री सिंह यह भी आरोप लगाते हैं कि ग्रोथ सेंटर, मंडी, वेयर हाउस, लोगिस्टिक सेंटर एवं आवासीय योजनाओं के लिए बिल्‍डर्स से मिलकर आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे के आसपास की जमीन खरीदवा दी गई। मैं कई नेताओं और नौकरशाहों की ऐसी जमीन गिना दूंगा।

आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे को लेकर नया विवाद तब शुरू हुआ जब यूपीडा के सीईओ नवनीत सहगल ने 17 सितंबर को ट्वीटर पर यह जानकारी दी कि 302 किमी लंबे आगरा-लखनऊ ग्रीनफील्‍ड एक्‍सप्रेस-वे के निर्माण पर 9056 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। सड़क निर्माण की लागत को लेकर सूर्य प्रताप सिंह से लगायत आईपी सिंह तक ने सवाल उठाया। सूर्य प्रताप सिंह ने एफबी पर लिखा, ”इस प्रदेश में जहां एक तरफ सूखा-बाढ़ से पीडि़त किसान, मजदूर व लोग गरीबी व भूख से मर रहे हैं। 1.5 करोड़ युवा बेरोजगार हैं। 43 प्रतिशत बच्‍चे कुपोषित हैं। गन्‍ना किसानों का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, ओलावृटि का किसानों का बकाया लंबित है, वहां कमीशन/भ्रष्‍टाचार के चक्‍कर में 30,000 करोड़ की उक्‍त परियोजना जल्‍दबाजी में चुनाव से पहले पूरा करने के लिए 100 रुपए के काम के लिए 2000 रुपए झोंककर जनता की खून-पसीने की कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। नेता-नौकरशाह अपनी जेब भर रहे हैं। इस कार्य को पीडब्‍ल्‍यूडी से न करा के एक नवगठित संस्‍था बनाकर मुख्‍यमंत्री के सीधे अधीन एक लंबे कद के चहते बदनाम नौकरशाह के माध्‍यम से कराया जा रहा है, जो मायावती के भी नाक के बाल रहे। एनआरएचएम घोटाले में भी सम्मिलित थे। इनके द्वारा बदनाम कुशवाहा मंत्री को 50 लाख देने का टेप भी सीबीआई के पास मौजूद है। और ऊपर से दोष छुपाने के लिए इस भ्रष्‍ट नौकरशाह को मुख्‍यमंत्री अपने हाथों से पुरस्‍कृत भी कर दिया।

उन्‍होंने एक्‍सप्रेस-वे में काम करने वाली चारों कंपनियों से करोड़ों के कमीशन खाने का आरोप भी लगाया है। साथ ही इसकी शिकायत कैग से करने का निर्णय लिया है। दरअसल एसपी सिंह के आरोपों को इसलिए भी दम मिलता है कि एक्‍सप्रेस-वे निर्माण में पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव रहा। आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे को लेकर बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने भी सरकार को घेरा था। इस एक्‍सप्रेस-वे पर तंज कसते हुए उन्‍होंने कहा था कि जो चीज 100 रुपए में बन सकती है, उस पर 2000 रुपए लगाए जा रहे हैं।

भाजपा नेता आईपी सिंह ने पीएम को भेजा पत्र

आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे में भ्रष्‍टाचार को लेकर प्रदेश प्रवक्‍ता भाजपा आईपी सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पूरे लूट-खसोट की सीबीआई जांच एवं सीएजी से ऑडिट कराने की मांग की है। पत्र में उन्‍होंने लिखा है कि 302 किमी लंबे एक्‍सप्रेस-वे का निर्माण उत्‍तर प्रदेश के उपक्रम यूपीडा द्वारा कराया जा रहा है। जिसमें कार्यकारी अधिकारी नवनीत सहगल आईएएस अधिकारी हैं। यह वही सहगल हैं, जो मायावती सरकार में हुई लूट-खसोट में मुख्‍य कर्ता-धर्ता थे, जिसमें हजारों करोड़ के भ्रष्‍टाचार के आरोप लगे थे, जो वर्तमान समय में धन बल का प्रयोग करके वर्तमान मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादवजी के बहुत करीब हो गए हैं। इस सरकार में वही भूमिका अदा कर रहे हैं, जो पूर्ववर्ती सरकार में कर रहे थे।

आईपी सिंह ने पत्र में यह भी लिखा है कि आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे पर प्रति किलोमीटर लगभग 14 करोड़ से ज्‍यादा की लागत आ रही है। इस प्रकार इस 302 किमी के एक्‍सप्रेस-वे के निर्माण पर लगभग 4200 करोड़ रुपए से ज्‍यादा की लागत आ रही है। इस गणना में जमीन का अधिग्रहण शामिल नहीं है। एक्‍सप्रेस-वे के निर्माण में ज्‍यादा लागत दिखाकर बड़े पैमाने पर लूट-खसोट की जा रही है। इस लूट-खसोट में आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल एवं समाजवादी पार्टी की सरकार लिप्‍त है।

यूपी के दागी अधिकारियों में शामिल हैं नवनीत सहगल

आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे में भ्रष्‍टाचार के आरोप लगने से पहले भी आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल कई आरोपों से घिरे रहे हैं। मायावती के शासनकाल में हुए एनआरएचएम घोटाले में भी उनके खिलाफ सीबीआई कोर्ट में धारा 164 के तहत बयान दर्ज है, लेकिन अपनी पहुंच और पकड़ के बल पर वे हमेशा बचते रहे हैं। प्रमुख सचिव धमार्थ कार्य रहते काशी विश्‍वनाथ मंदिर का ऑनलाइन प्रसाद वितरण का मामला हो या फिर कानपुर में जल संस्‍थान का मामला, नवनीत सहगल पर भ्रष्‍टाचार के आरोपों के बड़े-बड़े छींटे पड़े।

आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे में भ्रष्‍टाचार के आरोपों पर एक वेबसाइट से बातचीत में यूपीडा के सीईओ नवनीत सहगल ने कहा कि एक्‍सप्रेस-वे की लागत प्रोजेक्‍ट को जल्‍द करने की वजह से बनी। यह योजना ग्रीन फील्‍ड प्रोजेक्‍ट है इसलिए सड़क बनवाने पर जो लागत आई है, वह मुनासिब है। राज्‍य सरकार किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार है।

 

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