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यांत्रिक बूचड़खानों को नहीं बंद कर पाएगी योगी सरकार

लखनऊ। चुनावी जीत हासिल करने के लिए कई ऐसी बातें बोल दी जाती हैं, जिसे बाद में चुनावी ‘जुमला’ कह कर आगे निकल जाना पड़ता है। भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह के उत्‍तर प्रदेश के सभी यांत्रिक बूचड़खाने बंद करने के वायदे के साथ भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना दिखने लगी है। संभव है कि भाजपा का यह वादा जुमला साबित हो जाए।

दरअसल, उत्‍तर प्रदेश की योगी सरकार अगर अपने राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह के वायदे को अमल में लाने की कोशिश कर रही है, जिसके तहत उत्‍तर प्रदेश में संचालित अवैध बूचड़खाने धुंआधार तरीके से बंद कराए जा रहे हैं, लेकिन योगी सरकार यांत्रिक बूचड़खाने बंद कराने को बंद कराने के बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। योगी सरकार अगर ऐसा फैसला लेती है तो उसे केंद्र की अपनी ही भाजपा सरकार की नीतियों के विरोधाभास का सामना करना पड़ सकता है।

इन्‍हीं विरोधाभास की जमीन पर उसे कानूनी अड़चनों का भी सामना करना पड़ेगा, वो अलग। उत्‍तर प्रदेश सरकार अवैध बूचड़खाने तो बंद करा सकती है, लेकिन केंद्र सरकार से लाइसेंस प्राप्‍त यांत्रिक बूचड़खानों को बंद कराना उत्‍तर प्रदेश या केंद्र सरकार दोनों के लिए बहुत आसान नहीं होने वाला है। केंद्र सरकार ने पशु कटान एवं मांस उत्‍पादन को उद्योग का दर्जा दे रखा है। उत्‍तर प्रदेश सरकार अगर यांत्रिक बूचड़खानों के खिलाफ कोई कदम उठाती है तो उसे असहज भी होना पड़ सकता है।

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में उत्‍तर प्रदेश में बूचड़खानों को बंद कराने का वादा किया है। भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह भी चुनावी रैलियों में उत्‍तर प्रदेश के सभी यांत्रिक बूचड़खाने बंद कराने का ऐलान करते रहे हैं। भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद अब भाजपा तथा योगी सरकार पर दबाव है कि वह उत्‍तर प्रदेश में संचालित समस्‍त बूचड़खाने बंद कराएं तो कैसे?

केंद्र सरकार के अधीन संचालित कृषि और प्रसंस्‍कृत खाद्य उत्‍पाद निर्यात प्राधिकरण यानी अपेडा ने देश भर में 75 बड़े यांत्रिक बूचड़खानों को लाइसेंस दे रखे हैं, जिनके अकेले 41 बूचड़खाने उत्‍तर प्रदेश में संचालित हो रहे हैं। उत्‍तर प्रदेश में तो दो यांत्रिक बूचड़खाने का लाइसेंस तो योगी सरकार के शपथ लेने के बाद जारी किए गए, जिसका सबूत अपेडा की वेबसाइट है।

उत्‍तर प्रदेश में योगी सरकार के शपथ लेने से पहले देश भर में 72 यांत्रिक बूचड़खाने थे, जिनमें 39 उत्‍तर प्रदेश के हिस्‍से में थे, लेकिन शपथ लेने के बाद इनकी संख्‍या बढ़ कर 41 हो गई। उत्‍तर प्रदेश में सबसे ज्‍यादा बूचड़खाने अलीगढ़ जिले में हैं। यहां 8 कंपनियों को बूचड़खाने का लाइसेंस दिया गया है। इसके अलावा उन्‍नाव में 6, गाजियाबाद में 5, मेरठ में 3, बुलंदशहर में 3, आगरा में 2 तथा संभल में 2 बूचड़खानों को केंद्र सरकार की तरफ से लाइसेंस मिला हुआ है।

इनके अतिरिक्‍त बिजनौर, शामली, सहारनपुर, बाराबंकी, मुजफ्फरनगर, रामपुर, गौतमबुद्धनगर, झांसी, मुरादाबाद, रायबरेली, हापुड तथा बरेली में एक-एक कंपनियों को केंद्र सरकार ने मांस उद्योग के लिए लाइसेंस प्रदान किया है। इन 41 बूचड़खानों के अतिरिक्‍त केंद्र सरकार ने पूरे देश में 34 कंपनियों को मीट प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का लाइसेंस दे रखा है, जिसमें 23 उत्‍तर प्रदेश में हैं। सबसे ज्‍यादा 10 यूनिट गाजियाबाद में हैं।

दरअसल, सवाल केवल उत्‍तर प्रदेश में बूचड़खानों के बंद कर देने का नहीं है। उत्‍तर प्रदेश में सैकड़ों की संख्‍या में वैध-अवैध बूचड़खाने संचालित हो रहे हैं। उत्‍तर प्रदेश सरकार फिलहाल उन बूचड़खानों पर तालाबंदी करने में जुटी है, जिनके लाइसेंस नहीं हैं या फिर जिनके लाइसेंस रिन्‍यूवल नहीं हुए हैं या फिर खत्‍म हो गए हैं। चुनावी वायदे के अनुसार यांत्रिक बूचड़खानों पर तालाबंदी को लेकर अभी तक उत्‍तर प्रदेश सरकार ने कोई पहल नहीं की है।

संभव है कि बंद किए जा रहे तमाम बूचड़खाने लाइसेंस नवीनीकरण हो जाने के बाद अपने काम पर लग जाएं। केंद्र सरकार से अलग अगर उत्‍तर प्रदेश स्‍तर पर बूचड़खानों के आंकडों पर नजर डालें तो पशुपालन विभाग ने आरटीआई के जवाब में जो जानकारी दी है, उसके अनुसार उत्‍तर प्रदेश में बूचड़खानों की सख्‍ंया 285 है। दूसरी तरफ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास केवल 126 बूचड़खानों की जानकारी है।

जाहिर है कि सरकारी आंकड़ों में इसकी संख्‍या भले ही सैकड़ों में ही सिमट जाती है, लेकिन अवैध रूप से प्रदेश में हजार से ज्‍यादा छोटे-बड़े बूचड़खाना संचालित किए जा रहे थे। इनमें से ज्‍यादातर को नेता और अधिकारियों का संरक्षण मिला हुआ था। वैसे, यह जानना भी दिलचस्‍प होगा कि उत्‍तर प्रदेश से भी ज्‍यादा बूचड़खाने भाजपा शासित एक अन्‍य राज्‍य महाराष्‍ट्र में संचालित हो रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा मिले लाइसेंसों में भले इनकी संख्‍या यूपी के बाद आती हो, लेकिन प्रदेश स्‍तर पर यहां 316 बूचड़खाने संचालित किए जा रहे हैं।

उत्‍तर प्रदेश की पिछली सरकारों ने अवैध बूचड़खानों को बंद कराने में कोई दिलचस्‍पी नहीं दिखाई, क्‍योंकि एक तरफ यह वोट बैंक से जुड़ा मामला था तो दूसरी तरफ इससे उत्‍तर प्रदेश के भ्रष्‍ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों की जेबें भी भर रही थीं। अब नई सरकार ने बूचड़खानों पर तालेबंदी की शुरुआत कर दी है, लेकिन कब तक इस पर ताला लगा रहेगा, यह बड़ा सवाल है। अभी नई सरकार तेजी दिखा रही है तो प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी हड़बड़ाहट में हैं, लेकिन जैसे जैसे सरकार पुरानी होती जाएगी, अधिकारी अपनी पुरानी रंगत में आते चले जाएंगे।

उत्‍तर प्रदेश सरकार की पहल इसलिए और अधिक सराहनीय है कि केंद्र और उत्‍तर प्रदेश सरकार ने जिन बूचड़खानों को लाइसेंस दे रखे हैं, उनमें से अधिकांश मानकों का पालन तक नहीं करते हैं। कई स्‍लाटर हाउसों के पास ट्रीटमेंट प्‍लांट तक नहीं हैं। ऐसे बूचड़खानों से निकली गंदगी नालों या कूड़ा के जरिए ठिकाने लगाई जाती है, जिसका लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा असर पड़ता है।

पिछली समाजवादी सरकार के कई नेता इस उद्योग से जुड़े हुए थे। मांस के अलावा, चमड़े, हड्डी का काम भी पूरे प्रदेश में अवैध तरीके से किया जाता रहा है। इसका उदाहरण सपा नेता इरफान कुरैशी के यहां हुई छापेमारी में भी मिली है। यहां अवैध तरीके से केवल बिजली का ही इस्‍तेमाल नहीं किया जा रहा था बल्कि गोवंश की हड्डिया भी अधिकारियों ने बरामद करने का दावा किया है। दरअसल, यह तो केवल एक उदाहरण है।

पूरे उत्‍तर प्रदेश में नेता-अधिकारी और अवैध मांस कारोबारियों का गठजोड़ काम करता चला आ रहा है। उत्‍तर प्रदेश की सरकार के लिए भी लंबे समय तक इस पर लगाम कसे रखना आसान नहीं होगा। एक जानकारी अनुसार उत्‍तर प्रदेश के बीफ उद्योग में कई दलों के नेता, अधिकारी यहां तक कि पत्रकार भी प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। योगी सरकार के फैसले से ऐसे नापाक गठजोड़ की आमदनी पर भी असर पड़ रहा है।

संभव है कि यह गठजोड़ देर-सबेर ऐसा रास्‍ता निकाले ले, जिस पर लगाम लगाए रखना राज्‍य सरकार के लिए भी मुश्किल खड़ा कर दे। फिलहाल तो बड़ा सवाल यांत्रिक बूचड़खानों को बंद करने को लेकर उठ रहा है। जैसी आशंका जताई जा रही है, उसके लिहाज से उत्‍तर प्रदेश में संचालित बड़े यांत्रिक बूचड़खानों को बंद करवाना उत्‍तर प्रदेश सरकार के लिए आसान नहीं होने वाला है।

संभव है कि योगी सरकार केवल अवैध बूचड़खानों को बंद करके अपनी पीठ थपथपा ले। वैसे, भी हजारों करोड़ के इस उद्योग पर लगाम लगाना इतना आसान नहीं होने वाला है। राज्‍य के साथ केंद्र सरकार को भी इस उद्योग से भारी मुनाफा हो रहा है। इस स्थिति में तय है कि यांत्रिक बूचड़खानों को बंद करने का वादा चुनावी जुमला बताकर किनारा किया जा सकता है।

दरअसल, उत्‍तर प्रदेश के यांत्रिक बूचड़खानों को बंद करना वादा करने जितना आसान नहीं है। 29000 करोड़ से ज्‍यादा के इस निर्यात उद्योग पर तालाबंदी होने का असर देश की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ेगा। इसमें से अकेले उत्‍तर प्रदेश का हिस्‍सा 15000 करोड़ रुपए से अधिक है। केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-07 के दौरान मांस उद्योग को संगठित करने तथा उसके निर्यात में वृद्धि करने तथा देशी बाजार को सक्रिय रूप से व्‍यवस्थित करने के लिए पशु पालन डेरी एवं कृषि मंत्रालय ने पांच सदस्‍यीय उपसमिति नियुक्‍त की थी, जिसके सदस्‍य इस उद्योग के तमाम महारथी बनाए गए थे, जिसमें अध्‍यक्ष इरफान अलाना तथा सचिव डाक्‍टर एन कोंडाला को बनाया गया था। इनके अलावा डा. जेएस बरवाल, सतीश सब्‍बरवाल एवं आरके गोयल सदस्‍य बनाए गए थे।

इस समिति ने कहा था कि विश्‍व के कुल दुधारू पशुओं में भारत का 11.77 फीसदी पर कब्‍जा है, जबकि मांस उत्‍पादन में भारत का योगदान केवल 2.60 फीसदी ही है। इसी समिति ने यह भी बताया था कि दुनिया भर की भैंसों में 20.35 फीसदी भैंसे भारत के पास हैं, लेकिन दुग्‍ध उत्‍पादन में हमारा हिस्‍सा केवल 12.39 फीसदी है। इस समिति ने सुझाव दिया था कि भावुकता की दृष्टि छोड़कर हमें आर्थिक दृष्टि से सोचना चाहिए इतनी बड़ी संख्‍या में पशुधन हैं, लेकिन उनका उपयोग क्‍या है? इसलिए अच्‍छा होगा कि मांस उद्योग को बढ़ावा दिया जाए ताकि हम लोग अधिक से अधिक इन पशुओं का लाभ उठा सकें। इसके बाद से लगातार मांस उद्योग उछाल लेता जा रहा है।

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2013-14 में भारत ने 14,51,941 कुंतल बीफ निर्यात करके 26,472 करोड़ रुपए से ज्‍यादा का राजस्‍व प्राप्‍त किया था। मोदी के शासन के शुरुआती साल यानी 2014-15 में रिकार्ड बीफ का निर्यात किया गया। इस वर्ष भारत ने 14,76,309 कुंतल मांस का निर्यात करके 29,289 करोड़ रुपए का राजस्‍व कमाया था। वर्ष 2015-16 में इसमें आंशिक गिरावट जरूर नजर आई, लेकिन इस बार इसके रिकार्ड तोड़ देने का अनुसान है।

वर्ष 2015-16 में भारत ने 13,14,473 कुंतल मांस का निर्यात करके भारत ने 26,685 करोड़ रुपए की कमाई की। भेड़ और बकरे के मांस के निर्यात में भी देश लगातार बढ़ोतरी कर रहा है। पिछले तीन वित्‍तीय वर्षों में भारत को इस मद में निर्यात से क्रमश: 679, 821 तथा 833 करोड़ की आमदनी हुई है। बहरहाल, उत्‍तर प्रदेश सरकार के अवैध बूचड़खानों को बंद करने के कदम से संभव है कि उत्‍तर प्रदेश में वैध बूचड़खानों की संख्‍या में बढ़ोतरी देखने को मिले, क्‍योंकि जो लोग अवैध बूचड़खाने संचालित कर रहे थे, अब वैध तरीके से इस काम को करें।

टॉप फाइव में भारत

समूचे विश्‍व में भारत पशुओं की उपलब्‍धता के मामले में नंबर एक देश है। पूरे विश्‍व के 32 फीसदी पशु भारत में पाए जाते हैं। भारत विश्‍व का दूसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है, जबकि बीफ उत्‍पादन के मामले में 5वां सबसे बड़ा देश है। भारत में भी बीफ की खपत ज्‍यादा है। 3000 करोड़ रुपए से ज्‍यादा बीफ की खपत देश के अंदर हो जाती है।

बीते साल भारत बीफ निर्यात में पूरे विश्‍व में दूसरे नंबर पर था, संभवना है कि वर्ष 2017-18 में भारत ब्राजील को पीछे छोड़कर सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश बन जाए। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1960 में भारत मात्र 1 लाख 56 हजार मीट्रिक टन मांस का उत्‍पादन होता था, जो वर्ष 2014 तक बढ़कर 40 लाख मीट्रिक टन हो चुका है। वर्ष 2004 में भारत का विश्‍व में मार्केट शेयर जहां 6 फीसदी से कुछ अधिक था, वहीं वर्ष 2014 में यह बढ़कर 20 फीसदी से ऊपर हो चुका है।

पुराने कानून का पालन करा रही सरकार

उत्‍तर प्रदेश के अवैध बूचड़खानों को बंद कराने में योगी सरकार कुछ नया नहीं कर रही है बल्कि सरकार पुराने कानूनों का पालन करा रही है। अब तक दूसरी सरकारों ने अपनी जिम्‍मेदारियों का ठीक से निर्वहन नहीं किया, जिसके चलते योगी सरकार के काम को लेकर हो-हल्‍ला ज्‍यादा मच रहा है। उत्‍तर प्रदेश में कई हजार अवैध बूचड़खाने संचालित हो रहे थे तथा सरकारें और जिम्‍मेदार अधिकारी आंख मूंदे हुए थे।

लक्ष्‍मीनारायण मोदी बनाम भारत सरकार केस में उच्‍चतम न्‍यायालय ने वर्ष 2012 में आदेश दिया था कि राज्‍य सरकार कमेटी बनाकर शहरों में बूचड़खानों का जगह तय करके इनका आधुनिकीकरण सुनिश्चित कराएं। इसके बाद उत्‍तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण कंट्रोल बोर्ड यानी यूपीपीसीबी ने 140 अवैध बूचड़खानों को बंद कराने का आदेश दिए थे, लेकिन अधिकारियों ने इस आदेश को ठेंगे पर रख दिया।

प्रदूषण का खतरा

उत्‍तर प्रदेश में पिछले कई दशक से संचालित अवैध बूचड़खाने प्रदूषण के लिए भी लगातार खतरा बने हुए थे। अवैध तरीके से संचालित स्‍लॉटर हाउस अपने वेस्‍ट नालों और कूड़ो के जरिए ठिकाने लगा देते थे, जिसके चलते वातावरण बुरी तरह प्रभावित होता था। कई स्‍लॉटर हाउस रिहायशी इलाकों में संचालित हो रहे थे, जिसके चलते आम लोगों का रहना मुश्किल हो गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के अलईपुर में संचालित बूचड़खाने के चलते सड़क पर आवागमन करने वाले लोगों तक को परेशानी होती थी। पूरे प्रदेश में ऐसे ही हालात थे। पशुओं से निकले वेस्‍ट को भी अवैध बूचड़खाने संचालित करने वाले सार्वजनिक स्‍थलों पर फेक देते थे, जिसके चलते आसपास का वातावरण खराब होने के चलते प्रदूषण भी फैलता था। अवैध स्‍लॉटर हाउसों के बंद होने से उम्‍मीद की जा सकती है कि सरकार के इस कदम से अब लोगों को थोड़ी बहुत राहत जरूर मिलेगी।

 

-अनिल सिंह ,संपादक, प्रहार लाइव

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