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सपा -कांग्रेस गठबंधन में वोट ट्रांसफर हों, ये मुश्किल है !

‘राजनीति और गणित’ का करीबी रिश्ता जरूर है, लेकिन राजनीति में गणित के फार्मूले काम नहीं करते. राजनीति की गणित को धरातल पर खरा उतरने के लिए ‘केमिस्ट्री’ जरूरी होती है.

उत्तर प्रदेश में गणित के जरिये सत्ता वापसी के रास्ते पर निकली समाजवादी पार्टी को इस ‘केमिस्ट्री’ की तपन महसूस होने लगी है.

‘केमिस्ट्री’ की यह कमजोरी तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और एसपी मुखिया अखिलेश यादव की पत्रकार वार्ता में ही दिखने लगी थी. हालांकि, उस समय पत्रकारों के चुभते सवालों से दोनों नेताओं ने ‘बुद्ध की खामोशी’ ओढ़ पार पा लिया था. लेकिन कई बार मौन ज्यादा मुखर होता है.

राहुल के पीएम प्रत्याशी पद से संबंधित सवाल में अखिलेश का मौन बहुत कुछ कह गया. जबकि, इसी मंच से राहुल का ‘माया सम्मान’ भी लोगों के चेहरों पर कई आश्चर्य के चिन्ह छोड़ गया. बड़ी मशहूर गजल है ‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार नहीं होता है.’

उत्तर प्रदेश की राजनीति में में ये गजल अपने को दोहराती नजर आ रही है. जमीन पर कार्यकर्ताओं का मनभेद कम न था, अखिलेश की बगावत से घुट रहे पिता मुलायम ने कांग्रेस प्रत्याशियों के खिलाफ कार्यकर्ताओं को उतरने को कह उसे आवाज दे दी.

शिवपाल दे सकते हैं कांग्रेस को झटका 

इस बीच अपनी पार्टी से नाराज चल रहे शिवपाल यादव और राष्ट्रीय लोकदल के बीच कुछ ऐसा चल रहा है, जो गठबंधन में छोटी हिस्सेदार कांग्रेस को झटका दे सकता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के हिस्से ज्यादा सीटें आई हैं.

जाहिर है आकंड़ों में भले ही गठबंधन मजबूत दिखे लेकिन आपस में ‘केमिस्ट्री’ नहीं बैठा पा रहा है. दरअसल राजनीति में आंकड़ों की आभासी मरीचिका ने कई बार दिग्गजों की सत्ता प्यास को धोखा दिया है.पार्टी की कलह और कानून व्यवस्था के दाग को छुपाने के लिए एसपी ने जब कांग्रेस का हाथ पकड़ा तो उसके दिमाग में कांग्रेस को पिछले चुनाव में मिले 11.63 प्रतिशत मतों को जोड़ अहम था.

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