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सुनील बसंल होंगे यूपी भाजपा के सीएम !

              मनोज श्रीवास्तव

लखनऊ। उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अगर सरकार बनाने की हैसियत तक पहुंच जाती है तो कुशल संगठक सुनील बंसल मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं! लोकसभा चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश भाजपा को संवारने के लिए संगठन महामंत्री बनाकर भेजे गए बंसल के पास तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री व यूपी प्रभारी अमित शाह का बीटो था, जो अमित शाह के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद और पुख्‍ता हो गया। अध्‍यक्ष बनने के बाद राष्‍ट्रीय राजनीति में जिस तरह अमित शाह मजबूत हुए उत्‍तर प्रदेश में वही शक्ति सुनील बंसल को हासिल हो गई। यूपी में सुनील बंसल इतने शक्तिशाली संगठक के रूप में स्‍थापित हुए हैं कि उनके इशारे के बिना भाजपा में एक पत्‍ता नहीं हिलता है।

सुनील बंसल की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूपी विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनने की इच्छा लेकर जाने वाले आवेदकों से अमित शाह, राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा प्रदेश भाजपा के प्रभारी ओम माथुर, राष्ट्रीय सह संगठनमंत्री व यूपी भाजपा के सह प्रभारी शिवप्रकाश और स्वयं प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य तक एक ही सवाल पूछते हैं कि बंसल जी से मिले क्या? इन लोगों के अतिरिक्‍त भी पार्टी के कई लोगों को महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी देकर यूपी चुनाव में लगाया गया है, लेकिन सबका पहला सवाल वही होता है कि बंसल जी से मिले क्‍या?

पार्टी के उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों की माने तो ऊपर से ही जिम्‍मेदार लोगों को संदेश दिया गया है कि सब लोग बंसलजी का सहयोग करें! इस निर्देश की बानगी भी दिखती है, पार्टी कार्यालय के गेट से लेकर उनके लक्‍जरी कक्ष तक, जिस तरीके की त्रिस्‍तरीय सुरक्षा व्‍यवस्‍था रहती है, ऐसी सुरक्षा व्‍यवस्‍था भाजपा के अब तक के इतिहास में किसी अन्‍य संगठन मंत्री को नसीब नहीं हुई थी। भाजपा में सुनील बंसल की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह उत्‍तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की लोकप्रियता को भी चुनौती देते प्रतीत होते हैं। उनके साथ सेल्‍फी लेने के लिए कार्यकर्ताओं में इतनी होड़ मच जाती है कि कार्यालय के गेट से अपने निवास तक की कुछ मीटर दूरी तय करने में उन्‍हें आधे घंटे से ज्‍यादा समय लग जाता है।

भाजपा में जब से मोदी युग की शुरुआत हुई है, तब से संघ पृष्ठिभूमि के नेताओं को या मोदी फिर मोदी के विश्‍वसनीय लोगों को ही मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गयी है! सुनील बंसल उस मापदंड पर सबसे आगे हैं। एक तो उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह सख्‍त संगठन मंत्री की तरह स्थापित किया है। दूसरे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए कार्यकर्ताओं पर जिस किसी नेता की अपील का असर हो सकता है, उसमें बसंल सबसे आगे हैं। उनके सामने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के अलावा उत्‍तर प्रदेश में कोई औन नेता नहीं रह गया है। इसके अलावा पूर्व में भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्‍व विधानसभा चुनावों से पहले महाराष्ट्र में जो प्रमुखता देवेन्द्र फणनवीश को,हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर को, झारखण्ड में रघुवरदास को, असम में सर्वानन्द सोनेवाल को दिया, वैसा ही महत्त्व उत्तर प्रदेश में सुनील बंसल को मिल रहा है।

सियासी जानकर भी यह कह रहे हैं कि जब टिकट बंटवारे में सुनील बंसल ही सर्वेसर्वा हैं तो पार्टी के जो विधायक जीत कर आएंगे, उनकी व्‍यवहारिक पसंद एकमात्र बंसल ही होंगे, दूसरे किसी की संभावना नगण्‍य होगी। ऐसी स्थिति में स्‍पष्‍ट माना जा सकता है कि यूपी में अगर भाजपा को बहुमत मिला या भगवा पार्टी सरकार बना पाने की स्थिति में पहुंची तो सुनील बंसल निर्विवाद रूप से मुख्‍यमंत्री हो सकते हैं। संगठन को स्थापना काल से जानने वाले दर्जनों लोगों का विचार है कि अपने कठिन परिश्रम और राजनैतिक रणकौशल के बल पर यूपी भाजपा के इतिहास में संगठन के भीतर दबदबे का जो प्रदर्शन करने में सुनील बंसल सफल हुए हैं, उतना सफल तो कभी अटल बिहारी बाजपेयी और कल्याण सिंह भी नहीं हुए।

प्रचारक जीवन से वापस लौटे एक नेता का कहना है कि पहले के लोग यहीं पले बढ़े, यहीं संगठन में काम किये, बाद में ताकतवर हुए तो उनकी अन्तरंग टीम के अभिकांश लोग भी यहीं के थे, लेकिन राजस्‍थानी सुनील बंसल ऊपर से ही ताकतवर बना कर भेजे गये। उन्हें बना-बनाया संगठन मिला, जिसमें उन्होंने अनुशासन को प्राथमिकता दिया, जिसका अलग-अलग लोग अपने-अपने सुविधानुसार व्याख्या कर रहे हैं। मेरा मानना है कि यदि वह सहजता स्थापित करने में फंसे होते तो आज यूपी भाजपा में जो अनुशासन स्थापित हुआ है, वह कहीं नहीं दिखता। उन्‍होंने कार्यकर्ताओं से अनुशासनात्‍मक दूरी बनाकर ऐसा तेवर पैदा किया है, जिससे कार्यकर्ता उनमें अपना नेता ढूंढ रहा है।

बंसल की कार्यशैली के मुरीद तथा एबीवीपी के जमाने में उनको संगठन मंत्री के रूप में कार्य करते देख चुके लोगों के अनुसार, बंसल शैक्षणिक परिसरों के चुनाव में भी पहले जीतने वाले की तलाश करते थे, यदि वह विचार परिवार का है तो ठीक है, नहीं तो उसको संगठन से जोड़ते थे और एबीवीपी से लड़ा देते थे। इसी तरह वह उत्‍तर प्रदेश के एक-एक विधानसभा क्षेत्र में भी प्रत्याशी तलाशे हैं कि कौन जिताऊ नेता है? अपना है तो ठीक है, नहीं तो जो उपयुक्त है उसको पार्टी में अंतिम क्षण तक लाने की कोशिश किए। हार न मानने के हठी सुनील बंसल हमेशा एक नंबर पर ही रहना चाहते हैं। कठिन परिश्रम हो या रहन-सहन,या फिर हाव-भाव सब का चरमोत्कर्ष ही उन्हें पसंद है।



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