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70 साल बाद भी नही तलाशा जा सका बाढ का स्थाई हल

फरीद आरजू
बलरामपुर।हर साल की तरह इस साल भी यूपी के मैदानी इलाकों में भारी बारिश और नेपाल द्वारा छोडे गये लाखो क्यूसेक पानी के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ है।




राप्ती नदी और नेपाल से निकलने वाले कई पहाडी नालो के उफान के चलते बलरामपुर जिले के 200 से अधिक गाँव बाढ की जद मे है।बाढ की इस विनाशलीला के चलते जहा हजारो एकड कृषि योग्य भूमि जलमग्न हो गई वही दर्जन से अधिक लोगो को जान गवानी पडी है।बाढ से मानव जीवन का नुकसान तो हुआ ही लेकिन सम्पत्तियों का नुकसान भारी मात्रा में हुआ।इस बार की आपदा एक जगह पर केन्द्रित न होकर बड़े-छोटे रूप में सब जगह फैली हुई दिख रही है।बाढ से सड़क परिवहन ऐसा ध्वस्त हुआ कि मुख्य सड़कों को खुलने में भी 3 से 4दिन का समय लग गया।अपने समाज में दुखी व आपदा पीडित व्यक्ति की मदद करना और परिचित की खुशी को अपनी खुशी समझना हमारी मूल संस्कृति रही है।इस आपदा के समय भी आपदा प्रभावितों की सहायता के लिये हर तरफ से हाथ उठ खडे हुए है।प्रशासन की ओर से आपदा प्रभावित लोगो को तत्काल सहायता पहुचाने के लिए एनडीआरएफ तथा पीएसी के जवानो को लगाया गया है लेकिन आपदा की व्यापकता को देखते हुए आपदा की इस घडी मे शत प्रतिशत सफल नही हो सके है।बाढ पीडितो को पूडी सब्जी आदि उपलब्ध कराने मे भी प्रशासन की नीति कारगर होती नही दिखाई पड रही है जबकि सूबे के मुखिया योगी आदित्य नाथ ने जिले मे आई बाढ की विनाशलीला स्वयं अपनी आखो से देखा और सहायता पहुचाने मे किसी तरह की कोताही न बरतने का निर्देश अधिकारियो को दे रखा है।प्रशासन द्वारा अनुमोदित धनराशि आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिये नाकाफी साबित हो रही है।प्रशासन द्वारा चलायी जा रही आपदा राहत का एक दुखद पहलू यह है कि सरकार उन्हीं लोगों की सहायता के प्रति अधिक गम्भीर है जिनके परिवार में मानव जीवन की क्षति हुई है।दर्जनों गाँव ऐसे भी है जिनके घरों को नुकसान हुआ है और इनकी और परिवार की जान तो बच गयी लेकिन घर, मवेशी, अनाज, बर्तन, कपड़े और अन्य सम्पत्ति पूर्ण रूप से बाढ के पानी मे नष्ट हो गये है। ऐसे परिवार राप्ती नदी के तटवर्ती क्षेत्र में निवासरत है।इन्ही तटवर्ती गाँवो मे उतरौला तहसील का एक गाँव भरवलिया है जहा बाढ के पांच दिन बाद भी सहायता के तौर पर किसी अधिकारी व जनप्रतिनिधि ने पहुचना गवारा नही समझा,न पहुचने का कारण भी है,क्यो कि भरवलिया गाँव राप्ती नदी के उस पार स्थित है और नदी मे पानी के तेज बहाव मे कोई भी अधिकारी व जनप्रतिनिधि क्यो जाये?यहा के लोग अपनी छतो पर दिन रात गुजारने को मजबूर है।




जानकारी के मुताबिक इस बार आई बाढ ने दशको का रिकार्ड तोड दिया है।जिन क्षेत्रो मे कभी बाढ का पानी नही चढा उन क्षेत्रो मे इस बार पानी ही पानी नजर आ रहा है।गौर करने योग्य यह है कि प्रत्येक साल बाढ जिले मे अपना रौद्र रूप दिखाती है,लेकिन बाढ से निपटने के लिए न तो प्रशासन का कोई इंतजाम नजर आता है और न ही बाढ संसाधन।यही नही आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद भी सरककार भी बाढ के स्थाई समाधान का रास्ता नही तलाश कर सका है।ब।लहाल इस बार जिले मे जनप्रतिनिधि अपने दायित्वो को अंजाम देते दिखाई दिये।


उतरौला विधायक राम प्रताप वर्मा त।सील क्षेत्र के बाढ प्रभावित गाँवो पर पैनी नजर फबनाए हुए थे और स्वयं नाव की सवारी कर बाढ प्रभावितो की मद्द करते रहे। जानकारो की माने तो एनडीआरएफ और पीएसी के जवान इतनी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियो को अंजाम न देते तो शायद जिले मे बाढ से मरने वाले की संख्या सैकडा के अंक को पार कर जाए।
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