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फर्जी गो रक्षको के लिए सीख है गायों के भगवान जफरुद्दीन

लखनऊ .पुरे देश में जब गौ मांश के नाम पर गौ रक्षक गुंडे निर्दोष लोगो की जान के दुश्मन बने है ,इन हत्याओं पर रोक को लेकर देश में अलग अलग जगहों पर प्रदर्शन हो रहा है ऐसे में तथा कथित भगवाधारी गौ रक्षको के लिए नजीर है जफरुद्दीन. गाय की रक्षा का ढोग करने वाले लोग गौहत्या का आरोप जिस कौम पर लगाते है वही कौम का एक अमन पसंद व्यक्ति गायो का भगवान बना हुआ है .

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जनसत्ता के मुताबिक उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के जफरुद्दीन घायल गायों के रखवाले बने हुए हैं. जफरुद्दीन के गाय प्रेम को देखकर समाजसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी उनको सम्मानित करने का अनुरोध योगी सरकार से करने लगे हैं. जफरुद्दीन के अनुसार करीब तीन साल पहले खेत की बाड़ में लगे कटीले तार से एक गाय घायल हो गई थी. जब वह उसके पास गए तो उसने हाथ पर जीभ फेरना शुरू कर दिया. उसके बाद जफरुद्दीन उसे अपने घर ले आए. वे बताते है कि घर लाने के बाद उसके जख्म पर घरेलू दवाई लगाकर उसका उपचार करना शुरू कर दिया. उनका कहना है कि इसी वाकये के बाद उनके मन में गाय की सेवा करने की दिली इच्छा पैदा हो गई. उस घायल गाय को जफरुद्दीन ने अपने घर पर रख लिया फिर वह ठीक हो गई और कुछ दिन बाद दूध भी देने लगी. गाय का दूध मिलने के बाद उनके परिवार के लिए दूध का इंतजाम हो गया.

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जफरुद्दीन बताते है कि उन्हें जो अभी घायल गाय दिखती है वो उसे अपने घर ले आते हैं. इलाज के दौरान गाय को पकड़ने के लिए पड़ोसियों की मदद लेते हैं. अब तक करीब 500 से ज्यादा गायों की मरहम पट्टी कर के इलाज कर चुके हैं. इन दिनों में अपने घर पर इलाज के बाद ठीक हुई तीन गायों को रखने के अलावा बाकी को छोड़ दिया है .


जफरुद्दीन के दोनों छोटे भाई सिलाई का काम करते हैं. कई बार उनकी मदद कर देते हैं. इससे जरूरत पूरी नहीं होती तो वह डॉक्टर के पर्चे को लेकर किसी व्यापारी के पास जाते हैं और दवा खरीदने की गुहार लगाते है. इस तरह भी दवा का इंतजाम हो जाता है.घायल गाय के लिए दवा का किसी तरह इंतजाम कर लेते हैं लेकिन कई बार चारे के लिए मशक्कत करनी पड़ती है. अस्पतालों से दवाई मांग कर लाते हैं. जो दवाएं नहीं मिलती है उसके लिए अपनी जान-पहचान वालों से सहयोग लेते हैं.

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उत्तर प्रदेश के औरैया के अछल्दा ब्लाक के हरचंदपुर निवासी जफरुद्दीन गरीब दिहाड़ी मजदूर हैं. परिवार में बूढ़े पिता और दो छोटे भाई के अलावा पत्नी और दो बच्चे हैं .खेतीबाड़ी न होने की वजह से दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. सुबह काम पर जाने से पहले और शाम को लौटने पर वह गायों की सेवा में जुट जाते हैं.

श्रोत -जनसत्ता

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