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भारत के बर्बर और बलि-आहुति-यज्ञवादी प्राचीन कबीलाई धर्म से बौद्ध धर्म में प्रवेश ….?

दुनिया भर का इतिहास देख लीजिये, जब भी व्यापक पैमाने पर सभ्यतागत या नैतिक उत्थान या पतन हुआ है तो वो धर्मों के बदलाव से जुडा हुआ है. इस्लाम पूर्व काल का बर्बर समाज इस्लाम के आने के साथ सामाजिक, नैतिक रूप से एकदम से उंचाई छूने लगता है. उनकी सामाजिक राजनैतिक शक्ति दुनिया का नक्शा बदल डालती है. उनका वैचारिक और दार्शनिक फलक भी अचानक से विस्तार लेने लगता है.

यूरोप में जीसस के साथ केथोलिक इसाई धर्म के साथ पूरे यूरोप की सामाजिक नैतिक चेतना एक छलांग लेती है. बाद में मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेंट इसाइयत की धारा बनाते हैं और यूरोप में पुनर्जागरण की शुरुआत होती है. आज का यूरोप अमेरिका और शेष दुनिया में छा गयी विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की चमक इसी पुनर्जागरण से आई है.

चीन कोरिया और जापान का इतिहास भी बौद्ध धर्म से जुडा हुआ है. कन्फ्युशियास और ताओ को छोड़कर बौद्ध धर्म में प्रवश करते ही उन्होंने अपने समाज और राष्ट्र को एक नयी उंचाई पर पंहुचा दिया था. इसके बाद उनमे गजब के बदलाव हुए थे. उनके वैचारिक और दार्शनिक बदलाव बौद्ध धर्म से जुड़े हुए हैं.भारत के बर्बर और बलि-आहुति-यज्ञवादी प्राचीन कबीलाई धर्म से बौद्ध धर्म में प्रवेश करते ही प्राचीन भारत में एक सामाजिक नैतिक क्रान्ति होती है. बौद्ध काल का भारत ही वास्तव में वो भारत है जिसे पूरी दुनिया इतिहास और पुरातत्व में सम्मान से देखती है.

बौद्ध धर्म पर इस्लामिक और ब्राह्मणी आक्रमण के बाद भारत में बौद्ध धर्म के पतन के साथ ही भारत का सामाजिक और नैतिक पतन भी होता है. इसी सामाजिक, नैतिक और दार्शनिक पतन की स्थिति में भारत हजार साल तक बार बार गुलाम हुआ. भारत का वैचारिक, दार्शनिक और सभ्यतागत पतन असल में किसी अन्धविश्वासी और शोषक धर्म के हावी हो जाने की घटना से जुडा हुआ है, वो पतन अचानक कहीं आसमान से नहीं टपका है.

इस शोषक धर्म के खिलाफ और लगातार हो रहे वैचारिक, सामाजिक, सभ्यतागत और नैतिक पतन को रोकने के लिए अब अंबेडकर भारत को नवयान बौद्ध धर्म देकर गये हैं. ये भारत के लिए मार्टिन लूथर भूमिका है.जो मित्र भारत में दलितों बहुजनों को बौद्ध धर्म में जाने की पहल को व्यर्थ की कवायद मानते हैं वे पहले अरब, यूरोप, दक्षिण एशिया, और खुद भारत में हुई सांस्कृतिक, सामाजिक नैतिक क्रांतियों का इतिहास पढ़ें.

सभी देशों समाजों में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक क्रान्ति एक नए धर्म के साथ आरंभ होती है. पुरानी अस्मिता और पुराने धर्म को छोड़े बिना कहीं भी बदलाव नहीं होता. हो भी नहीं सकता. पुरानी अस्मिताओ को छोड़ने का व्यापक कार्यक्रम ही धर्म बदलना है.

व्यक्तिगत रूप से भी जब आप तरक्की करते हैं या स्वयं में बदलाव लाते हैं या सेल्फ इम्प्रूवमेंट करते हैं तो इस सेल्फ इम्प्रूवमेंट का अनिवार्य अर्थ पुराने सेल्फ से डिस्कनेक्ट करना ही होता है. पर्सनालिटी डेवलपमेंट के सिद्धांत भी इसी पर आधारित हैं.

इसलिए अंबेडकर का दिया हुआ बौद्ध धर्म भारत के दलितों बहुजनों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सभ्य और समर्थ होने की दिशा में सबसे बड़ी देन है. भारत बुद्ध को अपनाएगा तो सभ्य और समर्थ होगा.इसे अपने घर की दीवारों पर लिख कर रख लीजिये.

-संजय जोठे

(लेखक सामाजिक चिंतक है )

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