You are here

JDU बिवाद : हारी हुई जंग लड़ रहे सांसद शरद यादव

नई दिल्ली . जनता दल यू से पूर्व रास्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव का सफाया तय है फिर भी सांसद शरद यादव का गुट जदयू पर दावे के लिए नीतीश कुमार खेमे के सामने खड़ा होकर हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है.भारत निर्वाचन आयोग के सामने सांसद शरद यादव के समर्थन के भले ही दावे पेश किए जा रहे हों किन्तु दस्तावेजी सुबूत में शरद कैंप दूर-दूर नहीं टिक रहा. वह भी ऐसा दस्तावेज जिस पर शरद कैंप के सिपहसालारों के ही हस्ताक्षर हैं.

दैनिक जागरण के अनुसार ऐसे में माना जा रहा है कि शरद -नीतीश की इस लड़ाई में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खेमा ज्यादा समर्थ है.जदयू की लड़ाई संसद से लेकर चुनाव आयोग तक जारी है. संसद में शरद यादव की सदस्यता निरस्त करने के लिए जदयू की ओर से आवेदन दिया गया है, यूं तो शरद को कांग्रेस के कानूनी दिग्गजों से मदद की आशा है, लेकिन विरोधी दलों के मंच पर जाने का हश्र क्या होता है, यह भाजपा के ही पूर्व सांसद जय नारायण निषाद समेत कई अन्य मामलों में स्पष्ट है. निषाद की सदस्यता रद हो गई थी. जहां तक पार्टी पर दावे का सवाल है, यहां भी शरद के लिए जमीन पुख्ता नहीं है. दरअसल पिछले ही साल जदयू की ओर से पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के 193 सदस्यों की सूची चुनाव आयोग में दी गई थी. यह सूची 2016 के राजगीर सम्मेलन के बाद दी गई थी जिसमें नीतीश कुमार को शरद यादव के प्रस्ताव पर पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था. उस सूची पर तत्कालीन जदयू महासचिव जावेद रजा के हस्ताक्षर हैं. जो अब सांसद शरद यादव के साथ खड़े हैं.उस सूची के अनुसार 193 में 145 सदस्य मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ खड़े हैं. उसकी सूची ज दयू के महासचिव केसी त्यागी और संजय झा ने कुछ दिन पहले फिर से चुनाव आयोग को दी है. अन्य 30-35 सदस्य केरल के सांसद वीरेंद्र कुमार के साथ हैं, जो अब पूरी तरह जदयू से अलग हो चुके हैं. ऐसे में शरद खेमा चाहे जितने भी समर्थन के दावे कर ले, वह चुनाव आयोग में मान्य नहीं होगा.ध्यान रहे कि सपा की लड़ाई के वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था और बाजी अखिलेश यादव के हाथ गई थी. वह भी उस वक्त जब मुलायम सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. यहां जदयू की कमान भी नीतीश कुमार के पास है और सांसदों, विधायकों के साथ-साथ राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों का बहुत बड़ा हिस्सा भी नीतीश के साथ खड़ा है .

सांसद शरद यादव के खिलाफ पार्टी का संविधान भी है ,जिस संबिधान के अनुसार कोई अधिकतम दो बार ही राष्ट्रीय अध्यक्ष रह सकता है.शरद यादव लगातार तीन बार अध्यक्ष रहे थे.जिस बीच पार्टी का विस्तार केवल बिहार में हुआ जहां चेहरा नीतीश कुमार थे.

सूत्र बताते हैं कि चुनाव आयोग के पास महागठबंधन में टूट की शुरुआत से लेकर बाद में भाजपा के साथ सरकार गठन की परिस्थितियों तक की क्रमबद्ध जानकारी भी है. यह भी बताया गया है कि बिहार के पार्टी विधायकों की सहमति के बाद एक फैसला लिया गया, जिसका खुलेआम विरोध कर कुछ नेताओं ने अनुशासनहीनता की है. बताते हैं कि चुनाव आयोग इन सभी पहलुओं पर विचार कर जल्द अपना फैसला सुनाएगा.

श्रोत -जागरण

इसे भी पढ़े –

(खबर कैसी लगी बताएं जरूर. आप हमें फेसबुक, ट्विटर और गूगल प्लस पर फॉलो भी कर सकते हैं.)




इसे भी पढ़े -