You are here

तर्क की संभावना को कुचलने वाला ब्राह्मणवाद अब अपने पूरे शबाब पर है,आइए प्रोफेसर कांचा आइलैया के साथ खड़े हो

बुद्धिजीवी किसी “एक समुदाय से” जरुर हो सकता है लेकिन किसी “एक समुदाय का” नहीं होता. भारत जैसे असभ्य समाज में बुद्धि और बुद्धिजीवियों का अपमान करना और उन्हें सताना एक लंबी परम्परा है. यह बेशर्म परम्परा एक अखंड जोत की तरह जलती आई है, इसके धुवें और जहर ने देश समाज की आँखों को अंधा बना रखा है.सदियों सदियों से विचार और तर्क की संभावना को कुचलने वाला ब्राह्मणवाद अब अपने पूरे शबाब पर है. राजनीति अर्थनीति सहित नीति अनीति सब उनके हाथ में है. इसीलिये उनका छुपा हुआ एजेंडा एकदम खुलकर सामने आ गया है.

प्रोफेसर कांचा आइलैया भारत के एक प्रमुख दलित बुद्धिजीवी हैं. उनकी आवाज को खामोश करने का प्रयास करना न केवल दलित बहुजनों के हितों के खिलाफ है बल्कि स्वयं भारत के हितों के खिलाफ, दलित बहुजन इस देश की पच्चासी प्रतिशत जनसंख्या का निर्माण करते हैं और इन बहुजनों के हित में लिखने वालों को मुट्ठी भर अल्पसंख्यक ब्राह्मणवादी खामोश कराना चाहते हैं. ये अजीब स्थिति है, इसपर भी दुर्भाग्य ये है कि दलित बहुजन छात्र, छात्र संगठन, आम जनता बड़ी संख्या में प्रोफेसर आइलैया के साथ नहीं नजर आ रहे हैं. ये असल में अपने ही बच्चों एक भविष्य से गद्दारी करने जैसी बात है.

समाज के सबसे अँधेरे कोने में रौशनी फैलाने वाली मशाल को सामान्य से ज्यादा देखभाल और सम्मान की जरूरत होती है. दिन की रोशनी में खुले आंगन में जल रही मशालें बुझ भी जाएँ तो कोई नुक्सान नहीं होता लेकिन अँधेरे कोने कंदराओं में जहां देश समाज के खिलाफ सबसे भयानक कीटाणु और बीमारियाँ पनपती हैं वहां तक उस घुटन में जाकर उजाला करने वाले बुद्धिजीवियों की रक्षा करना पूरे देश और समाज की जिम्मेदारी है.

ये जिम्मेदारी जिन देशों और समाजों ने ठीक से उठाई है वे सभ्य हो सके हैं. तमाम संघर्षों के बावजूद यूरोप अमेरिका ने सिद्ध किया है कि वे विज्ञान तकनीक और लोकतंत्र के विकास के साथ सामाजिक और वैचारिक रूप से भी आगे बढ़ रहे हैं. मिडिल ईस्ट साउथ एशिया और विशेष रूप से भारत ने सिद्ध किया है कि ये समाज अभी भी मध्यकालीन मानसिकता में कैद हैं. इन समाजों में ऊपर ऊपर से विज्ञान और तकनीक की चमक जरुर ओढा दी गयी है लेकिन इनका मूल बर्बर और पाषाण कालीन चरित्र अभी भी इनकी चमड़ी के ठीक नीचे छुपा हुआ है.

भारत को सभ्य बनाने के लिए जरूरी है कि प्रोफेसर कांचा आइलैया और उनकी तरह काम करने वाले दलित बहुजन लेखकों चिंतकों कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दी जाए. हर बार जब भी इनपर आक्रमण होता है तब तब पूरे दलित बहुजन समाज को मिलकर प्रदर्शन करना जरुरी है ताकि भारत के मुट्ठीभर शोषक ये जान सकें कि भारत की बहुजन जनसंख्या अपने भविष्य के लिए जागरूक और संगठित हो रही है.
आइये प्रोफेसर कांचा आइलैया के पक्ष में और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में आवाज बुलंद करें .

– संजय जोठे 
( लेखक युवा विचारक है )

न्यूज़ अटैक हाशिए पर खड़े समाज की आवाज बनने का एक प्रयास है. हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए हमारा आर्थिक सहयोग करें .

न्यूज़ अटैक का पेज लाइक करें –
(खबर कैसी लगी बताएं जरूर. आप हमें फेसबुक, ट्विटर और गूगल प्लस पर फॉलो भी कर सकते हैं.)




loading…


इसे भी पढ़े -