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कवि कुमार विश्वास और ब्राह्मणवादी धर्म की असलियत

संबिधान निर्माता डॉ. अंबेडकर पर अशोभनीय टिप्पड़ी क्या कवि कुमार विश्वास किसी भूल चूक में ऐसा वक्तव्य दे रहे हैं? या वे बीजेपी आरएसएस स्टाइल ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं? या क्या वे सच में अपनी नैतिकताबोध और सभ्यताबोध का परिचय दे रहे हैं? पढ़े -सामाजिक चिन्तक संजय जोठे का लेख -

नई दिल्ली .हाल ही में कुमार विश्वास ने डॉ. अंबेडकर पर जो टिप्पणी की है उसके मद्देनजर कुछ बातें समझनी और समझानी जरुरी हैं. एक सुशिक्षित व्यक्ति द्वारा अंबेडकर पर जातिवाद के बीज बोने का आरोप लगाना और उसकी अगली ही सांस में अपने खुद के घर में पलते आये जातिवाद और सामंतवाद को बड़े अजीब तरीके से एक अच्छा उदाहरण बनाकर पेश करना एक विचित्र बात है. वे मात्र डेढ़ मिनट के अंदर अंबेडकर पर जातिवादी होने का आरोप लगा देते हैं और अपनी दादी से साथ दहेज़ में गुलाम की तरह आई एक दलित सफाईकर्मी महिला का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि किस तरह वह महिला हमारी माँ और चाची को ठीक से घूँघट न काढने पर गालियाँ दिया करती थीं और उस गाली के भय से ब्राह्मणी परिवार की ये महिलायें उनसे घबराती थीं.

कुमार विश्वास कहते हैं कि आजकल यह बदल गया है. गाँव पहले जैसे नहीं रहे हैं. कोई नेता आरक्षण और जातिवाद की राजनीति करने आया और कुमार विश्वास के गाँव और परिवार में जो आदर्ष स्थिति बनी हुई थी उसे भंग करके चला गया. ये व्यक्ति या नेता कौन है जिसने कुमार विश्वास के राम-राज्य को नष्ट कर दिया? वे स्वयं इसका उत्तर देते हैं कहते हैं “एक व्यक्ति आया जिसने आरक्षण की जातिवाद की राजनीति शुरू की” निश्चित ही ये आदमी आंबेडकर हैं.

अब सवाल ये उठता है कि क्या कवि कुमार विश्वास किसी भूल चूक में ऐसा वक्तव्य दे रहे हैं? या वे बीजेपी आरएसएस स्टाइल ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं? या क्या वे सच में अपनी नैतिकताबोध और सभ्यताबोध का परिचय दे रहे हैं?
इन तीनों संभावनाओं को समझिये, वे किसी भूल चूक में वक्तव्य नहीं दे रहे हैं, ये कोई स्टिंग ओपरेशन की सीडी नहीं है बल्कि वे सार्वजनिक रूप से एक जिम्मेदार मंच से और सोच समझकर बोल रहे हैं. दूसरी संभावना ये है कि क्या वे ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं? कुमार संभवतया आम आदमी पार्टी की तरफ से दलित और हिन्दू ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं कर सकते. ठीक से देखें तो अभी के हालात में कोई भी पार्टी दलित-हिन्दू ध्रुवीकरण करके जीत नहीं सकती क्योंकि राजनीतिक रूप से सफलता तय करने की स्थिति में अभी भी हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण ही जरुरी बना हुआ है, अभी इसी गाय में इतना दूध बचा हुआ है कि इससे अगले कई चुनाव जीते जा सकेंगे, इसलिए इस मुद्दे को छोड़कर कोई नये ध्रुवीकरण की कल्पना केजरीवाल या कुमार विश्वास नहीं कर सकते. दलित –हिन्दू ध्रुवीकरण को चुनावी राजनीति की सफलता की रणनीति बनाना अभी कम से कम आम आदमी पार्टी के लिए असंभव है.

तीसरी संभावना को देखिये, क्या वे इमानदारी से अपने सभ्यताबोध और नैतिकताबोध का परिचय दे रहे हैं? मेरा मानना है कि यही बात सच है. वे एक बहुत गहरी ब्राह्मणवादी मानसिकता को सहज ही उजागर कर रहे हैं. उनके मन में कभी ये बात नहीं उठती कि कोई स्त्री किसी दुसरी स्त्री के साथ आजीवन गुलाम की तरह दहेज़ में कैसे दी या ली जा सकती है? फिर वे ये भी नहीं सोच पाते कि उस महिला को आजीवन सफाई का काम ही क्यों करना है? आगे वे ये भी नहीं सोच पा रहे कि अपने ही ब्राह्मण परिवार की स्त्रीयों को घुंघट क्यों करना है? आगे वे ये भी नहीं सोच पा रहे हैं कि उस ‘गुलाम’ दलित महिला को किस स्त्रोत से इतना साहस मिल जाता है कि वह एक ब्राह्मण स्त्री को घुंघट न कर पाने की स्थिति में उसी के पति के सामने चुनौती दे दे?
इन बिन्दुओं को ध्यान से समझिये. ये असल में भारत में फैले ब्राह्मणवाद और उसके गर्भ से निकले बर्बर धर्म के जहर का असली स्वरुप है जिसने इस मुल्क को गुलाम अन्धविश्वासी और असभ्य बनाये रखा है.

इन बिन्दुओं में प्रवेश करते हुए आप एक विशेष तरह की नैतिकता, न्याय और सभ्यता को देख पायेंगे जो आपको सिर्फ भारत के ब्राह्मणवादियों के घर में ही मिलेगी.

कुमार विश्वास की बातों को आगे बढाते हुए देखिये, वे कहते हैं कि एक लक्ष्मी अम्मा उनके परिवार की किसी स्त्री के साथ दहेज में आयी थी. ये विशुद्ध सामंतवादी व्यवहार है जिसमे पुरुष या स्त्रीयां गुलाम की तरह खरीदी बेचीं जाती रही हैं, इस व्यवस्था में उनका अपने काम पर और अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है. यहाँ एक स्त्री को इंसान होने के नाते इतना भी अधिकार नहीं है कि वह अपनी ही खरीद फरोख्त के विरोध में एक या दुसरे पक्ष से कुछ बोल सके. आगे कुमार कहते हैं कि उस स्त्री को हम लक्ष्मी अम्मा कहते थे वो हमारे यहाँ सफाई का काम करने आती थी. ‘काम करने आती थी’ मतलब कि दादी के साथ दहेज़ में आने के बाद भी वह उनके परिवार के साथ नहीं रह रही हैं बल्कि कहीं अन्य जगह पर रह रही हैं. स्वाभाविक है एक ब्राह्मण परिवार एक दलित महिला को अपने साथ क्यों रखेगा? भले ही उस महिला का सारा दिन का कामकाज उस ब्राह्मण परिवार से जुडा हो लेकिन वो उनके साथ नहीं रह सकती.

इसके पहले कुमार विश्वास कहते हैं कि “एक आदमी (डॉ. अंबेडकर) आकर इस देश में जातिवाद की रीत डाल गया था, रिजर्वेशन के आन्दोलन के नाम पर उसके पहले झगड़ा नहीं था”. इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने इन लक्ष्मी अम्मा का जिक्र किया है. आगे कुमार कहते हैं कि लक्ष्मी अम्मा हमारी माँ या चाची को ठीक से घुंघट न लेने पर डांटती थी. अब इसका मतलब क्या हुआ? एक दलित और शोषित महिला एक सम्पन्न और रसूखदार परिवार की दुसरी महिला को डांट पा रही है, किस कारण? इस कारण कि वो महिलायें घुंघट ने करने के अपने व्यवहार से अपने ही परिवार की पुरुष सत्ता को चुनौती दे रही हैं. अब उनकी नजर में इस अपराध की सजा बहुत बड़ी है.

इसे ठीक से समझिये. जातिवादी भेदभाव तो अपनी जगह चल ही रहा है लेकिन प्रष्ठभूमि में एक और भयानक सडांध चल रही है, वो है ‘पुरुष सत्ता का अपनी ही घर की स्त्रीयों का शोषण’. इस शोषण के खेल को देखते हुए वो दलित स्त्री, वो लक्ष्मी अम्मा इतनी आश्वस्त है कि इस घूँघट का नाम लेकर वो अपने मालिको की औरतों को डांट पिला सकती है. लक्ष्मी अम्मा इस बात के लिए आश्वस्त है कि इस डांट की बात को सुनकर उस परिवार के पुरुष अपनी स्त्रीयों को दोषी ही ठहराएंगे और खुद उस दलित महिला पर कोई ताना नहीं मारा जाएगा. अब प्रश्न ये है कि लक्ष्मी अम्मा का ये आत्मविश्वास कहाँ से आ रहा है?
निश्चित ही लक्ष्मी अम्मा जिस समाज में और जिन परिवारों में रह रही है वहां जातिवाद से भी गहरा जहर- “पुरुषसत्ता और धर्मसत्ता का इकट्ठा स्वरुप” फैला हुआ है. असल में देखा जाये तो इस सम्मिलित सत्ता ने ही वर्णाश्रम धर्म और जाति पैदा की है जिसमे एक स्त्री - चाहे वो अपने ही परिवार की क्यों न हो - उसकी स्वतन्त्रता का कोई मूल्य नहीं है. आगे कुमार विश्वास कहते हैं कि उनकी दादी के समय कोई प्रोब्लम नहीं होती थी, जातियों के बीच कोई समस्या नहीं होती थी. लेकिन आज आप कुछ कह के दिखा दो जातियों में कुछ टिप्पणी करके दिखा दो तो खून हो जाएगा. अगर आज कोई दलित स्त्री ब्राह्मण स्त्री पर घूँघट न लेने पर टिप्पणी कर दे तो झगड़ा हो जाएगा.

अर्थात आज अंबेडकर की वजह से और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में ब्राह्मणों की ही स्त्रीयां अपने घुंघट से आजाद हो रही हैं और अपने पुरुषों से नहीं डर रही हैं, इसीलिये वे आज किसी लक्ष्मी अम्मा की गाली नहीं सुनेंगी. कुमार विश्वास के लिए ये भारी समस्या की बात है. आगे कुमार कहते हैं कि वो आदमी (डॉ. अंबेडकर) हमारा पूरा जातीय ढांचा तोड़ के चला गया. इसका एक अन्य अर्थ अब ये हुआ कि गाँव में दलित और ओबीसी जातियों में सवर्ण द्विज हिन्दुओं की अपमानजनक टिप्पणियों और गालियों को सहने की क्षमता खत्म हो गयी है और वे आत्मसम्मान की घोषणा करते हुए गालियों और तिरस्कारों का प्रतिकार करने लगे हैं. ये बदलाव कुमार विश्वास के लिए एक बड़ा नकारात्मक बदलाव है और भयानक चिंता का विषय है.

आगे चुनाव और उनके सामाजिक-राजनीतिक परिणाम के संबंध अपनी वास्तविक चिंता को उजागर करते हुए वे कहते हैं कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि 2019 में कौन जीतेगा. उन्हें इस बात की चिंता है कि वर्तमान सत्ता इस देश के हजारों साल के धार्मिक ढाँचे को तोड़ देगी. इस पूरे वक्तव्य में धार्मिक ढांचा और जातीय ढांचा उनके लिए दो महत्वपूर्ण चिंताएं हैं. इस बिंदु पर आकर हम समझ सकते हैं कि उनके धर्म बोध में धार्मिक ढाँचे और जातीय ढाँचे का मूल स्वरूप क्या है जिसे बचाए रखना है. ऊपर लक्ष्मी अम्मा का जिक्र करते हुए वे इन दोनों ढांचों की सम्मिलित विशेषता – धर्मसत्ता (असल में वर्णाश्रम धर्म) और पुरुषसत्ता की निर्विवाद श्रेष्ठता – को जाहिर कर चुके हैं.

इस प्रसंग को आगे बढाना जरुरी है. बात सिर्फ इतनी ही नहीं है कि कुमार ऐसा क्यों कह या समझ रहे हैं. इससे आगे बढ़ते हुए असल मुद्दा ये है कि एक सुशिक्षित और सम्पन्न ब्राह्मण ऐसे विचार कैसे रख सकता है और न सिर्फ अपने मन में वो ये सोच रहा है बल्कि उसे इतना आत्मविश्वास भी है कि उसकी बातों को चुनाव प्रचार के मंच से सहमती मिलेगी.उनमे इतना आत्मविश्वास कहाँ से आ रहा है? ये निर्णय वे कैसे कर पा रहे हैं? निश्चित ही लक्ष्मी अम्मा की तरह वे भी देख पा रहे हैं कि यहाँ हिन्दू धर्म से शासित समाज में क्या खेल चल रहा है और उस खेल में जीत हार के क्या नियम हैं.कुमार विश्वास असल में अपना निर्णय और उसकी संगत व्याख्या उदाहरण सहित देते हुए एक गहरी बात उजागर कर रहे हैं.

वे एक ख़ास किस्म के अनोखे धर्म और उस धर्म के सड़े हुए नैतिकता बोध और सभ्यता बोध को सामने ला रहे हैं. वो बता रहे हैं कि एक ब्राह्मण परिवार में सभ्यता और नैतिकता का क्या अर्थ होता है और उसका पालन कैसे किया जाता है. वो अपने कल्पित रामराज्य या धार्मिक ढाँचे का अनुमान भी दे रहे हैं जहां एक दलित सफाईकर्मी महिला अपनी खुद की स्वतन्त्रता या अधिकार के बारे में कोई आवाज नहीं उठायेगी बल्कि दूसरी महिलाओं को उनके पुरुषों से पिटवाने के लिए आवाज उठायेगी. ये "ग्रेडेड इन-इक्वालिटी" है जो अंबेडकर के अनुसार भारत का असली धर्म है. यह वर्णाश्रम धर्म का कुल जमा सार है. हर शोषित किसी अन्य का शोषण करते हुए सम्मान और ताकत का अनुभव करता है. कुमार विश्वास इसी व्यवस्था को बनाये रखने की अपील कर रहे हैं.

आगे इस मुद्दे को और गहराई से समझना होगा. असल में एक सुशिक्षित ब्राह्मण राजनेता द्वारा ऐसी टिप्पणी और व्याख्या देने का कहीं गहरा और ऐतिहासिक कारण है जिसका विश्लेषण डॉ. अंबेडकर ने स्वयं किया है. भारत के वर्णाश्रम धर्म में नैतिकता, न्याय बोध और सभ्यता बोध नहीं है. इसी कारण बड़े आराम से कोई भी दुसरी जाति के व्यक्ति का अपमान या हानि कर सकता है और बड़ी सहजता से कह सकता है कि यह तो इस देश और समाज का अनुशासन है यही हमारा धार्मिक या जातीय ढांचा है हम अपने ढाँचे या धर्म का पालन कर रहे हैं इसमें समस्या क्या है?

डॉ. अंबेडकर ने इस स्थिति को बहुत अच्छे से समझाया है . अंबेडकर ने प्रोफ़ेसर विलियम स्मिथ का हवाला देते हुए समाज या मनुष्य को केंद्र में रखकर बनाये गये धर्म एवं भगवान की व्याख्या का विवेचन किया है. अंबेडकर लिखते हैं कि धार्मिक आदर्श - दैविक अनुशासन (डिवाइन गवर्नेंस) के अर्थ में – दो श्रेणियों में आते हैं. पहली श्रेणी में समाज इसका केंद्र होता है और दूसरी में व्यक्ति केंद्र होता है. इन्ही दो केन्द्रीय सत्ताओं के हित की दृष्टि से शुभ-अशुभ की परिभाषा करते हुए समाज केन्द्रित धर्म में ‘उपादेयता’ (यूटिलिटी) महत्वपूर्ण हो जायेगी और व्यक्ति केन्द्रित धर्म में ‘न्याय’ महत्वपूर्ण हो जाता है.

लेकिन भारत का हिन्दू धर्म इन दोनों में से किसी भी श्रेणी में नहीं आता और यह न तो समाज के हित की उपयोगिता से न ही एक व्यक्ति के न्याय की आवश्यकता से शासित होता है बल्कि यह एक वर्ग विशेष – ब्राह्मण वर्ग - के हितों की चिंता से शासित होता है. हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में पापों के प्रायश्चित्त के उपाय के रूप उल्लिखित ब्राह्मण भोज और ब्राह्मण को दान देने के विश्वास को आज भी समाज में देखा जा सकता है. पाप पुण्य और प्रायश्चित्त और पाप मुक्ति या पुण्य अर्जन सहित श्राद्ध की इस धारणा से आ रही सलाह के केंद्र में न तो व्यक्ति का हित सध रहा है न ही समाज का यहाँ केवल ब्राह्मण का हित हो रहा है.

इस प्रकार यहाँ कर्म विशेष की सामाजिक हित में उपादेयता और व्यक्ति हित में न्याय की संभावना – दोनों से परे जाकर हिन्दू धर्म ब्राह्मण वर्ण का ही हित साध रहा है और उन्ही की सामाजिक, राजनीतिक, और धार्मिक अधिपत्य को पीढी दर पीढ़ी मजबूत कर रहा है.

अंबेडकर के इस विश्लेषण की नजर से कुमार विश्वास की टिप्पणी का अर्थ समझिये. आप समझ सकेंगे कि कुमार विश्वास असल में वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखने, जातिव्यवस्था और शोषण को बनाये रखने और ब्राह्मणों को इस देश में सर्वेसर्वा बनाये रखने के लिए अधिक चिंतित हैं. वे जिस तरह की राजनीति आकर रहे हैं उसके केंद्र में उनकी चिंताओं का वास्तविक स्वरुप क्या है उन्होंने इमानदारी से स्पष्ट कर दिया है.

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अन्य राजनेताओं की तरह वे किसी असमंजस के शिकार नहीं हैं न ही वे किसी को अँधेरे में रखना चाहते हैं. उन्होंने अपनी चिंताओं की स्पष्ट घोषणा की है. इस ईमानदार अभिव्यक्ति के लिए और अपनी और अपनी पार्टी की राजनीतिक वैचारिकी की दशा और दिशा स्पष्ट करने के लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया जा सकता है.
- संजय जोठे

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