You are here

शेर क्यों बना मां दुर्गा की सवारी

मां दुर्गा की मूर्तिशक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के प्राकट्य से लेकर महिषासुर मर्दन तक अनेक पौराणिक कथाएं हैं। हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों और तस्वीरों में अक्सर उन्हें उनकी सवारी के साथ दर्शाया जाता है। भगवान के हर स्वरूप और उनकी सवारी का अपना महत्व और जुड़ाव है जिसके पीछे शास्त्रों में कई कथाओं का भी वर्णन किया

है। मां दुर्गा तेज, शक्ति और सामर्थ्य की प्रतीक हैं और उनकी सवारी शेर है। शेर प्रतीक है आक्रामकता और शौर्य का। यह तीनों विशेषताएं मां दुर्गा के आचरण में भी देखने को मिलती है। महिषासुर को मारने के लिये सभी देवताओं ने अपने-अपने शस्त्र उन्हें दिये थे, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन मां दुर्गा की सवारी शेर कैसे बनी, इसके पीछे एक रोचक कथा है।

सती, पार्वती, शक्ति जैसे न जाने कितने ही स्वरूप मां दुर्गा में समाहित हैं। कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिये कठोर तपस्या की थी। कठिन तपस्या से उनका रंग सांवला हो गया था। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए।

मान्यता के अनुसार, एक दिन भगवान शंकर ने माता पार्वती का उपहास उड़ाते हुए उन्हें सांवली कह दिया। माता पार्वती को यह बात काफी खराब लगी। नाराज पार्वती ने एक बार फिर कठोर तपस्या शुरू कर दी। घनघोर जंगल में तपस्या के दौरान माता पार्वती के पास एक भूखा शेर आकर बैठ गया। शेर इस इंतजार में रुका रहा कि कब देवी की तपस्या खत्म होगी और वह उन्हें अपना आहार बनाएगा।

इस तरह कई वर्ष बीत गये। देवी तपस्या करती रहीं और शेर वहीं डटा रहा। देवी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें गोरा होने का वरदान दिया। वरदान मिलने के बाद माता पार्वती ने स्नान किया। स्नान के बाद उनके शरीर से एक देवी का जन्म हुआ, जो माता गौरी कहलाईं।

स्नान के बाद देवी पार्वती ने देखा कि एक शेर लगातार उन्हें देख रहा है। देवी को पता चला कि वह शेर उन्हें खाने के लिये सालों से इंतजार कर रहा है। इस बात पर देवी काफी प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा कि जैसे मैंने इतने दिनों तक तपस्या की, ठीक उसी तरह इस शेर ने भी मेरे इंतजार में तपस्या की। उन्होंने शेर को वरदान देते हुए उसे अपना वाहन बनाया।

दूसरी कथा के अनुसार

इसी संबंध में दूसरी कथा है, जो स्कंद पुराण में उलेखित है। इसके अनुसार शिव के पुत्र कार्तिकेय ने देवासुर संग्राम में दानव तारक और उसके दो भाई सिंहमुखम और सुरापदमन को पराजित किया। सिंहमुखम ने अपनी पराजय पर कार्तिकेय से माफी मांगी जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसे शेर बना दिया और मां दुर्गा का वाहन बनने का आशीर्वाद दिया।साभार

 

इसे भी पढ़े -