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व्यवसायीकरण पत्रकारिता के कारण निरंकुश होती राजसत्ता

पत्रकारिता समाज की दशा को सच्ची दिशा देने का एक मिशन माना जाता है समाज को उच्च आदर्शों के प्रति योगदान और समर्पण के लिए प्रेरित करता है पत्रकारिता को इसीलिए एक पेशा,व्यवसाय कभी नही माना गया..यह एक मिशनरी सेवा है जिसमें बलिदान के प्रतिफल में सिर्फ सम्मान व यश ही मिलता है.

बलिदान भी ऐसा जिसमें पत्रकारिता के लिए तो जीवन का सर्वस्व कुर्बान हो जाता है.एक सच्चा पत्रकार अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वो में निश्चित रूप से असफल व गैरजिम्मेदार ही सिद्ध होता है .पत्रकार के प्रति इतने समर्पण के बाद भी पत्रकारिता अपने आदर्श व लक्ष्य के शिखर की दिशा से भटक कर पतन की ओर अग्रसर है आखिर क्यों ? एक गंभीर व चिंतन मुद्दा है लेकिन आज की पत्रकारिता ने जब अपना चरित्र या उद्देश्य ही बदल लिया तो फिर उसके मुद्दे भी बदल गये, अब पत्रकारिता मिशनरी सेवा से पेशा और व्यवसाय बन गयी है, प्रतिष्ठित जीवन की चाह बन गई है, राजनीति से मुखालफत को जज्वा छोड़ जुगलबन्दी में मशगूल हो गई, राजनैतिक दलों को सत्ता तक पहुँचाने की उपादान मात्र बन कर रह गई है.नतीजन राजसत्ता निरंकुश और तानाशाह बन बेधड़क शोषक बन चुकी है जनता की आवाज गुम के साथ पत्रकारिता गुमराह भी करने में महती भूमिका अदा कर रही है.

सारे वादे झूठे और अधूरे सिद्ध हो रहे है लेकिन पत्रकारिता की महिमा से सभी वादे प्रसंशनीय रूप से पूर्ण होते दिखाये जा रहे है…जनता पत्रकारिता के इस बदले व्यवहार और चरित्र से किंकर्तव्यविमूढ़ है, कुंठित भी है.अब तो जनता को न राह दिख रही है न ही कोई उम्मीद.

-देवेंद्र वर्मा (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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