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उलटे संबैधानिक हक़ दलितों से शातिराना तरीके से छीन रही भाजपा

आमोद उपाध्याय

उत्तरप्रदेश में दलित मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया?प्रचण्ड बहुमत वाली बीजेपी के पास अच्छा अवसर था।इसके बावजूद वह एक दलित को राष्ट्रपति बनाने जा रही है और इसका ढिंढोरा भी पीटना शुरू कर दी है।चूँकि शिक्षित समाज जनता है कि भरतीय संविधान ने राष्ट्रपति को कोई भी absolute शक्ति नहीं दी है।

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राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधीन है।राष्ट्रपति मात्र विधेयकों पर अनुमति देने का कार्य करता है।वह अपनी इच्छा से कुछ नही कर सकता।ज्ञानी जैल सिंह जैसा व्यक्ति ही सरकार के कुछ विधेयकों को जेब में रखकर सबक सिखा सकता है।लेकिन एक संघी व्यक्ति जो पहले से ही एक विचारधारा का बंधक है ,से तटस्थता की उम्मीद नहीं की जा सकती है।राष्ट्रपति तटस्थ रहकर अपने पद की गरिमा के अनुरूप मूंकदर्शक बना केंद्र सरकार की मनमानी में शरीक होता है।ऐसा पद किसी दलित ,आदिवासी ,अल्पसंख्यक को दे भी दिया जाय तो क्या मतलब निकलेगा?

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इसके विपरीत मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री का पद डिसीजन मेकिंग का केंद्र और संचालक होता है।इस पर पदासीन व्यक्ति सही मायने में समाज और देश को नई दिशा दे सकता है।यूपी में प्रचण्ड बहुमत प्राप्त बीजेपी यदि वास्तव में दलित हितैषी होती तो वह दलितों को वास्तविक शक्ति वाला पद देती।इसके अलावा अन्य प्रदेशों में भी बीजेपी की बहुमत की सरकारें बनी लेकिन किसी में भी बीजेपी ने दलित को मुख्यमंत्री नही बनाया।ये कैसे दलित हितैषी हैं?उलटे संबैधानिक हक़ दलितों से शातिराना तरीके से छीने जा रहे हैं।

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