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पश्चिमी देशों का विज्ञान जब वर्ण, जाति, गोत्र से भरे ‘महान’ भारत में घूमने आया तो क्या हुआ ?

नई दिल्ली .एक दिन पश्चिम का विज्ञान भारत घूमने आया. आते ही उसने भारतीय संस्कृति देवी और भारत के इतिहास बाबू को कुश आसन पर पद्मासन में बैठे गहन धार्मिक (गधा) विमर्श करते हुए देखा. दोनों भाई बहन थे.

थोड़ी देर उसने उनकी बातें सुनने की कोशिश की लेकिन संस्कृत भाषा के सूत्रों और मन्त्रों से भरी बातचीत वो समझ न सका. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबू ने नवागंतुक को देखकर नमस्कार किया और उनका आपस में परिचय हुआ. विज्ञान बाबू से पूछा गया कि आप कहाँ से आये हैं आपका वर्ण कुल गोत्र और जाति क्या है?

विज्ञान बाबू ये प्रश्न समझ नहीं सके वे वर्ण जाति कुल गोत्र आदि के महान भारतीय आविष्कारों से परिचित न थे. लेकिन संस्कृति देवी और इतिहास बाबू ने जिद पकड़ ली उन्होंने कहा कि “भद्रपुरुष जब तक हम ये न जान लें तब तक हमारी धमनियों में रक्त जमा रहता है, हमारा भोजन नहीं पचता हमारा मल मूत्र विसर्जन भी रुक जाता है”

जब पश्चिम के विज्ञान ने दिया अपना परिचय-

ऐसी भीषण अवस्था देखकर विज्ञान को दया आई, वो बोला “मैं पश्चिम देश से आया हूँ मेरे पिता का नाम प्रयोग और माता का नाम जिज्ञासा है. मैं असल में वर्ण संकर हूँ। मेरे माता-पिता के अन्य कई मित्र सहयोगी हैं जो एकसाथ रहते हैं, कौशल, साहस, सहकार, सभ्यता और खोज और आविष्कार ये सब हमारे परिवार में इकट्ठे रहते हैं, आप समझ लें मैं इन सबको माता-पिता समान समझता हूँ”

अब वर्ण संकर शब्द सुनते ही भारतीय संस्कृति और इतिहास ने नाक सिकोड़ ली लेकिन ऊपर-ऊपर सभ्य बने रहे, भारतीय मेजबानों को ये बात समझ न आई कि ये प्रयोग क्या होता है और जिज्ञासा क्या होती है ? साहस, सहकार सभ्यता भी उनके लिए नए नाम थे. फिर भी वे मूढ़ नजर नहीं आना चाहते थे इसलिए बनावटी हसी हंसते हुए बोले “अच्छा अच्छा हम इन्हें जानते हैं, खूब जानते हैं”.

मेहमान ने साहस बटोरते हुए मेजबानों के माता पिता का नाम पूछा तो दोनों मेजबान बोले “हमारे माता पिता दोनों एक ही हैं, न सिर्फ माता पिता बल्कि वे ही हमारे दादा दादी पितामह महापितामह इत्यादि भी हैं, वे ही हमारे अतीत हैं और वे ही हमारे भविष्य भी हैं.” अब विज्ञान चक्कर खाकर गिरने को हुआ. उसने पूछा ये क्या गजब की बात कर रह हैं आप ऐसा कैसे हो सकता है?

संस्कृति देवी-इतिहास बाबू का अनोखा जवाब-

संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बड़ी सयानी हंसी हँसते हुए बोले “महाशय आप इस पुण्यभूमि पर नए नए आये हैं अभी तो चमत्कारों की शुरुआत भर है”. विज्ञान हाँफते हुए बोला कि ठीक है मैं सदैव नए ज्ञान को सीखने का प्रयास करता हूँ अब कृपया अपने माता पिता का नाम तो बताइये.

तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबू ने दोनों हाथों से अपने कान छूते हुए आंख बंद करके एक स्वर में कहा “पुराण हमारी माता है और पुराण ही हमारा पिता है”

विज्ञान ने ये शब्द पहली बार सुना था, वो सहज जिज्ञासा करते हुए पूछने लगा कि ये उभयलिंगी प्राणी हमारे देश में नहीं होता ये प्राणी, मतलब अपने माता पिता करते क्या हैं? मेजबान बोले “ वे स्वयं कुछ नहीं करते बल्कि जो कुछ भी दूसरों का किया धरा है उसे अपने श्रीमुख से संस्कृत सुभाषित बनाकर बोल देते हैं.

वे जो बोलते हैं उसी को हम वचनामृत समझकर गृहण करते हैं और उसी का चरणामृत इस पुण्यभूमि पर बांटते निकल पड़ते हैं”। विज्ञान की उत्सुकता बढती गयी. उसने कहा कि ये तो गजब की बात है क्या आप मुझे पुराण जी से मिलवा सकते हैं? संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बोले “हाँ-हाँ क्यों नहीं वे अभी जंगल मैदान गए हैं निपट के आ जाएँ फिर यहीं बैठकर तत्वचर्चा करते हैं”

अब पुराण महाशय भी अवतरित हुए-

पांच मिनट बाद ही पुराण महाशय ढीली धोती, खड़ाऊ, लोटा और जनेऊ संभाले हुए और संस्कृत मन्त्र बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे. उनके आज्ञाकारी पुत्र-पुत्री ने उनके चरण स्पर्श किये.

विज्ञान ने उनसे हाथ मिलाना चाहा लेकिन मंत्र पाठी पुराण जी ने दूर से ही नमस्कार किया और जींस टीशर्ट पहने खड़े इस गौर वर्ण युवक को घूरने लगे. इतिहास बाबू ने परिचय दिया “ये पश्चिम देश से आये हैं. सौभाग्यवती जिज्ञासा देवी और चिरंजीव प्रयोग बाबू के सुपुत्र हैं यहाँ पुण्यभूमि पर आपसे तत्वचर्चा कर धर्मलाभ लेने आये हैं”

जिज्ञासा और प्रयोग का नाम सुनकर पुराण जी भी कुछ समझ न पाए लेकिन विश्वगुरु की गर्वीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले “अच्छा अच्छा … जिज्ञासा और प्रयोग … जानते हैं … खूब जानते हैं इन्हें … ये पहले भारत वर्ष में ही रहते थे, यहीं अपने सत्यनारायण महाराज के मंदिर के पीछे वाली गली में.

हमने इन्हें अपनी गोद में खिलाया है” … विज्ञान बाबू ये सुनकर गदगद हो गये कि चलो परिचय का कोई सूत्र निकल आया, लेकिन वे इस चमत्कार को समझ न सके. वहीं संस्कृति देवी और इतिहास बाबू ने अपने पिता के दुबारा चरण छुए और अपने चमत्कारी पिता पर गर्व से फूल बरसाए.

अगला भाग आपको जल्द ही मिलेगा……

                             – संजय श्रमण जोठे 

( लेखक समाजविज्ञानी व  अन्तर्राष्ट्रीय शोधार्थी हैं )

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