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अशोक विजयदशमी आज ,संबिधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर ने आज के ही दिन छोड़ा था हिंदू धर्म

दलित संगठन मनाएंगे महान सम्राट अशोक विजयदशमी का समारोह 

सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने के दसवें दिन तक मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयदशमी कहते हैं. इसी दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी.अशोक विजयदशमी पर्व के अवसर पर ही 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर ने नागपुर की दीक्षाभूमि पर अपने पांच लाख समर्थको के साथ तथागत भगवान गौतम बुद्ध की शरण में आये और बौद्ध धर्म ग्रहण किया. इस कारण इस दिन को “धम्म चक्र परिवर्तन” दिवस के रूप में भी मनाया जाता है.

विजय दशमी बौद्धों का पवित्र त्यौहार
ऐतिहासिक सत्यता है कि महाराजा अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाने की घोषणा कर दी थी. बौद्ध बन जाने पर वह बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए. तथागत गौतम बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने तथा अपने जीवन को कृतार्थ करने के निमित्त हजारों स्तूपों शिलालेखों व धम्म स्तम्भों का निर्माण भी कराया.सम्राट अशोक के इस धार्मिक परिवर्तन से खुश होकर देश की जनता ने उन सभी स्मारकों को सजाया संवारा तथा उस पर दीपोत्सव किया. यह आयोजन हर्षोलास के साथ १० दिनों तक चलता रहा, दसवें दिन महाराजा ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण किया .

धम्म दीक्षा के उपरांत महाराजा ने प्रतिज्ञा की, कि आज के बाद मैं शास्त्रों से नहीं बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करूँगा. इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजयदशमी के रूप में मनाता है.

लेकिन ब्राह्मणो ने इसे काल्पनिक राम और रावण कि विजय बता कर हमारे इस महत्त्वपूर्ण त्यौहार पर कब्ज़ा कर लिया है.जहां तक दशहरे की बात है तो इससे जुड़ा तथ्य यह है कि
चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य तक कुल दस सम्राट हुए. अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य की उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या कर दी और “शुंग वंश” की स्थापना की.पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण था. इस समाज ने इस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया. उस साल यह अशोक विजयदशमी का ही दिन था. उन्होंने “अशोक” शब्द को हटा दिया और जश्न मनाया. इस जश्न में मौर्य वंश के 10 सम्राटों के अलग-अलग पुतले न बनाकर एक ही पुतला बनाया और उसके 10 सर बना दिए और उसका दहन किया. 2500 साल के सम्राट अशोक के विरासत से जोड़ते हुए 14 अक्टूबर1956 को अशोक विजयदशमी के दिन ही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी.

फेसबुक पर ही भारतीय मूल निवासी संघठन के महासचिव सूरज कुमार बौद्ध लिखते है कि रावण दहन करने वाले लोग कायर हैं और रावण के महान संदेश अमर है.

दलित संगठन मनाएंगे महान सम्राट अशोक विजयदशमी का समारोह
दलित समाज के संगठन आल इंडिया एससी/एसटी रेलवे कर्मचारी एसोसिएशन, ओबीसी रेलवे कर्मचारी एसोसिएशन, बाबा साहब डॉ. बीआर अंबेडकर सोसायटी, गुरद्वारा श्री गुरू रविदास सेवक सभा, भारतीय बोध महासभा पंजाब, शिरोमणी शहीद बाबा जीवन सिंह वैलफेयर सोसायटी, भगवान वाल्मीकि नौजवान सभा, बामसेफ संस्था एवं संग्रह वैलफेयर सोसायटी की ओर से शनिवार को संयु्क्त तौर पर महान सम्राटअशोक विजय दशमी मनाई जाएगी. रेल कोच फैक्टरी के लवकुश पार्क में बाद दोपहर 2 बजे समारोह का आयोजन होगा.

समारोह की प्रधानगी अलग-अलग संस्थाओं के प्रधान करेंगे.मुख्य प्रवक्ता परमिंदर सिंह एसडीओ, ओबीसी के मुख्य प्रवक्ता धनी प्रसाद एवं अशोक विजय दशमी के इतिहास के बारे में जानकारी देंगे. समारोह में एससी/एसटी के जोनल प्रधान जीत सिंह, वर्किंग प्रधान रणजीत सिंह नाहर, एडीशनल सचिव कर्ण सिंह, ओबीसी एसो‌सिएशन के जोनल प्रधान उमा शंकर सिंह, महासचिव वेद प्रकाश, आरके पाल, अंबेडकर सोसायटी के प्रधान किशन लाल जस्सल, महासचिव धर्म पाल पैंथर, गुरू रविदास सभा के प्रधान अमरजीत सिंह, उप प्रधान कशमीर सिंह, हरविंदर सिंह खैरा, महासचिव अवतार सिंह मौड़, बौद्ध महासभा के प्रधान सुरेश चंद्र बोध, सविच तेज पाल सिंह, बामसेु के प्रधान बहम पाल सिंह, सचिव बदरी प्रसाद, भगवान वाल्मीसकि सभा से चेयरमैन संजीव नाहर, प्रधान विजय चावला और संग्रह से मैडम बिबियाना एवं मरीनुस आदि ने इलाके की समूह सहयोगी अंबेडकरी मिशनरी संस्थाएं शामिल होंगी.

इस मौके धर्मपाल पैंथर ने बताया कि समारोह को सफल बनाने के लिये समूह संस्थाओं के ओहदेदारों की जिम्मेगवारी लगा दी गई है. इस आयोजन से एक नई परंपरा की शुरुआत होगी. अब तक सम्राट अशोक के बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक मंचों से ही नहीं हुई है. इसलिए यह कदम उठाया गया है.

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