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भीम आर्मी मुखिया चन्द्रशेखर असुरक्षित ,सरकार कि मंशा में खोट

नई दिल्ली.सहारनपुर में शांति बहाली की कोशिस लगातार जारी है ,शाम होते ही किसी अप्रिय घटना के डर से दंगाग्रस्त इलाके के लोग घरो में दुबक जाते है ,इस बीच लोगो में चर्चा है कि सरकारी मशीनरी के सहारे सरकार शांति के साथ साथ भीम आर्मी के लोगो को चिन्हित कर रही है ,पुनः दलित समाज सामानांतर अन्याय का प्रतिकार ना कर सके इस योजना को जन्म दिया जा रहा है.इस दंगे में प्राण गवा चुके दलितों कि सरकार ने सुध नहीं ली जिनके परिवार का कमाऊ पूत इस दंगे कि भेट चढ़ गया है ,जिनका परिवार रात दिन सिसकियो और आसुओ के सैलाब में डूबा हुआ है .उत्तर प्रदेश के गृह सचिव का यह कि भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्र शेखर के सरेंडर करने के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया जायेगा,भविष्य के खतरे कि तरफ इशारा तो नहीं ,सवाल उठना लाजमी है कि दिल्ली में जंतर मंतर पर नीले आसमान के नीचे जब चंद्रशेखर सामन्तवादी ताकतों व सरकार को ललकार रहा था तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया,क्या चन्द्रशेखर को लेकर सरकार कुछ ताना -बना बुन रही है .

जंतर मंतर से दहाड़ रहा रावण
जंतर मंतर से दहाड़ रहा रावण

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सहारनपुर मामले पर पूर्व आईजी एस.आर.दारापुरी का कहना है कि उत्तर प्रदेश कि योगी सरकार सहारनपुर में पीड़ित दलितों को सबक सिखाने पर उतारु है. एक तरफ सरकार भीम आर्मी के नाम पर तीन दर्जन दलित युवकों को गिरफ्तार करती है जिन में 80% छात्र हैं, दूसरी तरफ शब्बीरपुर में 5 मई को दलितों पर हमले के दोषियों में से केवल 9 लोगों को ही गिरफतार करती है साथ ही हमले के शिकार 9 दलितों को भी गिरफ्तार कर लेती है .

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उन्होंने कहा कि 9 मई को भीम आर्मी की प्रशासन के साथ झड़प भी प्रशासन की ही गलत कार्रवाही का परिणाम थी क्योंकि उस दिन जिला प्रशासन द्वारा ही भीम आर्मी के सदस्यों को शब्बीरपुर के मामले में पीड़ितों को मुयावजा घोषित न करने तथा हमलावरों की गिरफ्तारियां न करने को लेकर रविदास छात्रावास में शांतिपूर्ण ढंग से की जाने वाली मीटिंग न करने देने, उन्हें गाँधी पार्क में भेजने तथा वहां पर भी उन पर लाठी चार्ज करके खदेड़ देने के कारण ही हुयी थी. इसके बाद जिला प्रशासन ने शब्बीरपुर के दलितों पर हमले के मामले में न तो शीघ्रता से मुवावजे की घोषणा की और न ही हमलावरों की गिरफ्तारी पर बल दिया . इससे दलितों को आभास हुआ कि प्रशासन दलितों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया तथा हमलावरों के प्रति नर्म रुख अपना रहा है.

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जंतर मंतर पर एक हुए दलित
जंतर मंतर पर एक हुए दलित

कल उत्तर प्रदेश के गृह सचिव का यह बयान दिया कि भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्र शेखर के सरेंडर करने के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया जायेगा यह भी सरकार का दलितों को सबक सिखाने की कार्रवाही का ही प्रतीक है, यह सर्विदित है कि किसी भी आरोपी को पुलिस अथवा कोर्ट के सामने सरेंडर करने का अधिकार है. क्या इस मामले में प्रशासन द्वारा चन्द्र शेखर को कोर्ट में सरेंडर करने से रोकने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेना दलित विरोधी मानसिकता का प्रतीक नहीं है? जहाँ तक उसकी पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का प्रश्न है उसने तो 21 मई को दिल्ली में उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने गिरफ्तारी हेतु आत्मसमर्पण किया ही था तब उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं की गयी?

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अस्मिता बचाने हेतु जंग को तैयार रावण कि फ़ौज
अस्मिता बचाने हेतु जंग को तैयार रावण कि फ़ौज

उन्होने आगे कहा, ‘एक तरफ जहाँ शब्बीरपुर में दलित लड़कियों की शादी में राजपूतों की हिस्सेदारी उनके गाँव में जातीय सौहार्द को पुनर्स्थापित करने के प्रयास का प्रतीक है वहीँ प्रशासन द्वारा भीम आर्मी की आड़ में दलितों का उत्पीड़न करना तेजी से लौट रहे जातीय सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास है. उन्होंने सरकार से यह मांग किया है कि सहारनपुर में भीम आर्मी की आड़ में दलितों को सबक सिखाने के लिए की जा रही उत्पीड़न की कार्रवाही को तुरंत रोका जाये, शब्बीरपुर के दोषियों को गिरफ्तार किया जाये, स्थिति को सही ढंग से सँभालने में चूक करने वाले अधिकारियों को दण्डित किया, जातीय नव सामंतों के बढ़े हुए मनोबल पर रोक लगाई जाये तथा हमले में घायल लोगों के उचित इलाज़ की व्यवस्था की जाये.

फिरहाल भविष्य में यदि भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर के बिरुद्ध सरकार संबिधान से इतर कोई कार्यवाही को अंजाम देती है तो अंजाम भयावह होने कि संभावना प्रबल हो जायेगी .

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