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वर्तमान मीडिया पर प्रहार करती सूरज कुमार बौद्ध की कबिता, पढ़े -“मजबूर कलम”

मजबूर कलम

वाह रे मीडिया,
शरीफों की शक्ल में
एंकरी गुंडों का जमावड़ा
आततायी नजर आते हैं।

हमने तुम्हें बेबाक समझा
तेरी कलम को बेदाग समझा
और तुम हर रोज दलित दलित करके
हमारी आवाज को बहिष्कृत करके
हमें जलील करना अपनी फितरत बना बैठे हो।

हमने समाज पर चिंतन किया
तुमने ‘दलित चिंतक’ कहा।
फिर ब्राह्मण ठाकुरों के चिंतन पर
तुम्हें ‘ब्राह्मण चिंतक’ से परहेज क्यों?
अखलाक की मौत की परवाह कहां
तुम मांस गौमांस करते रहे।
रोहित को बार बार मारा गया
और तुम दलित पिछड़ा करते रहे।
कभी JNU में कंडोम खोजते हो
कभी दंगों में मोम खोजते हो।
दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे, लंकेश.. कलमकारों की मौत पर ढोंग करते हो।

बिलासी चहारदीवारों में कैद होकर
शब्दों की मकड़जाल से ओतप्रोत
प्रायोजित आंकड़ों का पुलिंदा पेश करते हो
जहां अपने भारी भरकम शब्दों से
गरीबों को अमीर
शोषकों को दयावान
बेगुनाहों को गुनाहगार करार देते रहते हो।

टीआरपी के मोह में तुम्हारा झूठ और लूट
बारूदी सच को बाहर झांकने नहीं देती
खैर गुनाह पत्रकारों का ही नहीं
उस व्यवस्था का भी है जो उन्हें
तोता बने रहने पर बाध्य करता है।
गुनाह उन धर्मशास्त्रों का भी है जो
सवर्ण-शुद्र मानसिकता सिखाता है ।

ऐसे में हमारी बात
तुम्हारी बात नहीं बन सकती है।
मजबूर कलम कभी भी
मजबूत आवाज नहीं बन सकती है।

– सूरज कुमार बौद्ध,
(रचनाकार भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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