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ब्राह्मणवादी पाखण्ड के काम करने का ऐतिहासिक तरीका है, जिसका साकार रूप आप ओशो रजनीश

 

ब्राह्मणवाद और ओशो रजनीश जैसे धूर्त गुरु इसी तरह भारत को हर मोड़ पर पाखंड के दलदल में वापस घसीटते रहते हैं. ये भारत का असली दुर्भाग्य है. आज भारत का समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है वो शुद्धतम ब्राह्मणवाद द्वारा पैदा की गयी समस्याएं हैं. इसे गौर से पहिचान लीजिये और ओशो रजनीश जैसे धूर्तों को बेनकाब कीजिये. बुद्ध और कबीर को मिटाने वाले इनके षड्यंत्रों से बचकर रहिये. कम से कम भारत के गरीबों दलितों शूद्रों और स्त्रीयों को इन बाबाओं से बचकर रहना चाहिए.

एक बार ओशो रजनीश से किसी ने बुद्ध के बारे में प्रश्न किया. बात अनत्ता अर्थात अनात्मा की हो रही थी, रजनीश ने सनातनी ब्राह्मणी चाल चलते हुए उत्तर दिया कि अनात्मा और आत्मा एक ही है जैसे कि पूर्ण (ब्रह्म) और शून्य एक ही है. सुनने वाले जो कि अक्सर भक्त टाइप के लोग होते हैं वे इस उत्तर से बड़े प्रभावित होते हैं और इस दिव्य “संश्लेषण” से चमत्कृत हो जाते हैं. ठीक इसी तरह अरबिंदो घोष भी “सुप्रामेंटल” या अतिमानस की धारणा देते हैं और पूर्व और पश्चिम को मिलाकर एक करने की बात करते हैं. उनके भक्त भी उनकी इन बातों से बड़े प्रभावित होते हैं.

रजनीश जैसे बाबाओं से ये पूछा जा सकता है कि अगर आत्मा अनात्मा एक ही हैं तो बुद्ध को अनात्मा शब्द के इस्तेमाल की क्या जरूरत आन पड़ी थी? क्या बुद्ध ने स्वयं आत्मा और अनात्मा को एक ही कहा है? इसका उत्तर ये ब्राह्मणवादी धूर्त नहीं दे सकते. असल में ये किसी भी प्रश्न का उत्तर सीधे सीधे दे ही नहीं सकते. ये हमेशा दूसरों के कंधे पर बन्दुक रखके सामान्य जन की तर्कबुद्धि का शिकार करते हैं. इसी तरह आत्मा परमात्मा तक को एक ही सिद्ध करते हैं, फिर पदार्थ और परमात्मा को भी एक ही सिद्ध करते हैं. इनके इस एकीकरण के प्रोजेक्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक ही सिद्ध न किया जा सके. लेकिन हकीकत में जमीन पर ये धूर्त कुछ भी एक नहीं होने देते.

पश्चिमी दार्शनिकों और विचारकों ने भारतीय दर्शन पर एक गंभीर टिप्पणी की है कि भारतीय दर्शन या विचार में विचार के स्तर पर हर विरोधी बात का एकीकरण या संश्लेषण हो जाता है लेकिन सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में एकीकरण एकदम असंभव है. इस सनातनी एकीकरण के गीत गाने वील महान दार्शनिक शंकराचार्य भी अद्वैत के गीत गाते फिरते थे लेकिन स्त्री, सेवक, कामगार और शूद्रों को छूने में घबराते थे. इनके मन में गहराई से झांकें तो पता चलता है कि ये लोग एकीकरण या अद्वैत की बात ही इसलिए निकालते हैं कि ये अपने भेदभाव भरे धर्म को भेदभाव के आरोप से मुक्त कर सकें.

इनसे कोई पूछे कि महाराज आपकी धर्म व्यवस्था में स्त्री को शिक्षा का या सम्मान का अधिकार क्यों नहीं है तो ये तपाक से उत्तर देते हैं कि कण कण में ब्रह्म समाया है उसी का नूर फैला है अतिमानस का प्रकाश फैला है फिर स्त्री पुरुष का भेद कैसा? ऐसी हवा हवाई बात सुनकर हमारे लोग शांत और संतुष्ट भी हो जाते हैं. ये भी एक गजब का चमत्कार है.

असल में ओशो रजनीश भारतीय ब्राह्मणवादी षडयंत्र का सबसे कामयाब उदाहरण हैं. उनकी जीवनयात्रा और उनके नाम बदलने से लेकर सैद्धांतिक बदलाव करने की रणनीतियों का ठीक से अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि वे किस तरह सिद्धांतों और शास्त्रों से खेल रहे हैं और प्रगतिशील या विचारवान होने के परदे के पीछे हर धर्म हर संप्रदाय के अंधविश्वास को बढाते हुए उन्हें ब्राह्मणवाद की जहरीली त्रिमूर्ति – आत्मा, परमात्मा और पुनर्जन्म में घसीट रहे हैं.
उनके किसी भी शिष्य से पूछ लीजिये, वे बुद्ध की अनात्मा की बात करते हुए भी अंतिम रूप से अपने खुद के सात सौ साल पुराने तिब्बती अवतार की बात करते हैं और भारत तिब्बत सहित अन्य देशों के अन्धविश्वासी संप्रदायों को फिर से अतीत के खूंटे से बाँध देते हैं. उनके शिष्य समुदाय में भी जो लोग हैं वे उनकी किताबों के अलावा कुछ पढ़ते नहीं हैं इसलिए समस्या और बढ़ जाती है.

ये असल में ब्राह्मणवादी पाखण्ड के काम करने का ऐतिहासिक तरीका है जिसका साकार रूप आप ओशो रजनीश और उनके बाद चल रहे उनके शिष्यों के आश्रम में देख सकते हैं. ब्राह्मणवाद का एक केंद्रीय चरित्र ये है कि वो खुद बाँझ होता है वो कुछ भी नया पैदा नहीं कर सकता. वो हर दो सौ पांच सौ साल में दूसरों के पैदा किये हुए ज्ञान को अपनी भाषा में अनुवाद करता है और आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के जहरीले दलदल में डुबाकर उसे नया नाम दे देता है.

ये इन्होने बुद्ध, महावीर और कबीर के साथ किया है. महान गोरखनाथ को भी इन्होने ऐसे ही नष्ट किया है. फिर ये नए दर्शन को ब्रह्मा विष्णु महेश के किसी पौराणिक अवतार से जोड़ देते हैं और सारा श्रेय ले उड़ते हैं. साथ में इनके लट्ठबाज भक्त पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ उनके मत और परंपराओं को आग लगते रहते हैं. बाद में जब पुराने दार्शनिकों के ग्रन्थ और परम्पराएं जमीन से समाप्त हो जाती हैं तो इन ब्राह्मणवादी धूर्तों की पौराणिक गप्पों को फैलाने वाला तंत्र सक्रिय हो जाता है. ये इनकी आजमाई हुई तकनीक है.

इसीलिये इनके पास इतिहास नहीं है. जो दूसरों के घर में चोरी करते हैं वे अपनी चोरी का इतिहास कभी नहीं लिखते. इतिहास के नाम पर पुराण की गप्प लिखी जाती है, उसे वे कुछ इस तरह लिखते हैं कि असल में दार्शनिक सिद्धांत और विचार जिन्होंने पैदा किये उनका कोई उल्लेख न हो, उनके वास्तविक इतिहास उनके जन्म मरण की तिथि और उनके जीवन के बारे में कोई सबूत न रह जाए. इसीलिये भारत में कबीर तक के बारे में पक्की जानकारी नहीं है की उनका जन्म कब हुआ और उनकी मृत्यु कब हुई या उनके माता पिता या स्वयं उनका धर्म क्या था. अब कबीर कोई बहुत पुराने व्यक्ति नहीं हैं. पश्चिम में यूरोप में उनके पास साफ़ साफ़ इतिहास है, उनके महापुरुष विचारक या राजा सामंत आदि से जुदा इतिहास तिथियाँ इत्यादि उनके पास हैं.

लेकिन भारत अभी भी पुराण में फंसा हुआ है. अभी हाल ही में गुजरे शिर्डी के साईंबाबा के बारे में भी ब्राह्मणवादी धूर्तों ने यही खेल रचा है. साईंबाबा की तस्वीर और ढंग देखकर एकदम समझ में आता है कि वे मुस्लिम थे, लेकिन उनका प्रभाव ऐसा था कि उनका इतिहास और उनकी वल्दियत मिटा दी गयी. जो खेल कबीर के साथ हुआ वही साईंबाबा के साथ हो रहा है. ये है ब्राह्मणवाद का तरीका, दूसरों की मेहनत को हजम करके अपने खाते में दिखाना इनका पुश्तैनी धंधा है.

ये धंधा ओशो रजनीश ने खूब चलाया है. खुद उनके लेक्चर्स में वे बार बार कहते हैं कि उन्होंने लाखों किताबें पढ़ीं हैं. ये सही भी है. लेकिन इस विराट अध्ययन का इस्तेमाल वे किस तरह कर रहे हैं? ये बात बहुत महत्वपूर्ण है. इस अध्ययन का इस्तेमाल वे असल में अलग अलग संप्रदायों के अंधविश्वासों का शोषण करने के लिए कर रहे हैं. इसी अध्ययन के द्वारा वे पश्चिम में जन्मे महान दार्शनिकों विचारकों को जान समझ रहे हैं और उन्हें इधर-उधर से काटकर आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म के रेडीमेड ताबूत में ठूंस रहे हैं.

एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ. रजनीश जब साठ के दशक के अंत में वामपंथी विचारों से भरे वक्तव्य दे रहे थे तब उन्होने देखा कि इस तरह उनका बड़ा प्रभाव नहीं होने वाला है. तब उन्होंने भारत की सनातन अंधविश्वास भरी बुद्धि का उपयोग करने का निर्णय लिया और लोगों को संन्यास और ध्यान आदि सिखाने लगे.

ये तरीका सफल रहा. इसके बारे में उनके खुद के वक्तव्यों से सबूत मिलते हैं. उन्होंने खुद कहा है कि वे एकबार लेनिन के सहयोगी मानावेंद्र्नाथ रॉय से मिले थे और रॉय को उन्होंने सलाह दी थी कि “जब तक आप बाबाओं जैसा वेश धारण न करें इस मुल्क में आपको कोई नहीं सुनेगा”. अब आप सोचिये जो आदमी मंवेंद्र्नाथ रॉय जैसे महान विचारक और दिग्गज साम्यवादी को ये सलाह दे सकता है वो खुद इसका पालन क्यों नहीं कर सकता ?
ओशो ने आगे यही किया है. अब बाद में ये सज्जन स्वयं को भगवान् घोषित करते हैं और ध्यान समाधि की शिक्षा देने लगते हैं. उस जमाने में पश्चिम में फ्रायड और जुंग के साइको एनालिसिस की धूम मची थी और नवधनाड्य अमेरिकी मध्यमवर्ग के बच्चे चरस गांजे और फ्री सेक्स के पीछे पागल हुए दुनिया भर में घूम रहे थे. ओशो ने इस बात को ठीक से पकड़ा. उसी समय महान मनोवैज्ञानिक विल्हेम रेख ने ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट शुरू किया था जो केथार्सिस या रेचन के आधार पर दमित भावनाओं के निकास द्वारा मनोचिकित्सा करता था.

इस मूवमेंट में सेक्स और कुंठा सहित बचपन के व्यक्तिगत दमन और सामूहिक दमन के सहज मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा चिकित्सा की जाती थी. इस मूवमेंट के द्वारा कई तरह के थेरेपी ग्रुप और एनकाउन्टर ग्रुपों की रचना की. इन सभी बातों को ओशो रजनीश ने सीधे सीधे उठा लिया, ठीक उसी तरह जैसे अरबिंदो घोष ने नीत्शे और डार्विन को उठा कर अतिमानस बना डाला था, या विवेकानंद ने भगिनी निवेदिता के मार्गदर्शन में केथोलिक मिशन को उठाकर रामकृष्ण मिशन बना डाला था.

ओशो रजनीश ने जब ये खेल शुरू किया तब पश्चिमी हिप्पियों का हुजूम भारत आने लगा. ह्युमन पोटेंशियल मूवमेंट को सक्रिय ध्यान और तंत्र की खोल में ट्रांसलेट करके ये बाबाजी ऐसा दिखाने लगे कि ये उनकी कोई महान खोज है. गांजे चरस और फ्री सेक्स को खोजते हुए ये हिप्पी यहाँ जम गए और भारतीय भक्त इस बात से बड़े प्रसन्न हुए कि हमारे बाबाजी को फिरंगी गोरे लोग कितना मानते हैं. अब चारों तरफ धूम मच गयी. इस कंट्रास्ट को मेनेज करना कठिन था लेकिन असंभव नहीं. ऐसी ब्राह्मणवादी धूर्तता का सारा प्रयोग रजनीश ने अपने बचपन में भी खूब किया है. उनकी आत्मकथा इन बातों से भरी पड़ी है कि वे कैसे भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाते थे और अपना काम निकाल लेते थे.उनके भक्त उनकी इन “लीलाओं”के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते हैं, लेकिन इनमे छुपी अनैतिकता को देखना नहीं चाहते.

पश्चिमी हिप्पियों और सन्यासियों सहित भारत के अंधविश्वासियों को एक साथ एक ही आश्रम में संतुष्ट रखना ही वो असली बिंदु है जिससे रजनीश के विरोधाभासी वक्तव्य निकलते हैं. अपने सामने बैठी इस अजीब सी भीड़ को जब वे प्रवचन देते थे तब उन्हें एक संतुलन बनाना होता था. किसी बात में एकदम अंधविश्वास की तारीफ़ करेंगे और अगली बात में उस अंधविश्वास को एकदम उड़ा देंगे. इस तरह सामने की भीड़ में बैठे सभी तरह के लोग संतुष्ट होकर उनसे चिपके रहते और चंदा देते रहते.

इस बात को गौर से देखिये. सडक किनारे एक पेड़ के नीचे बैठे किसी तोताछाप ज्योतिष या बाबा से कभी बात कीजिये, वो भी यही तकनीक इस्तेमाल करता है. आपको कुछ कहेगा और आपके बाद के ग्राहक को कुछ और कहेगा. अगर आप दोनों साथ मिलकर उससे वही बात पूछें तो वो एकदम रहस्यवाद में उतर जाएगा और वेद वेदान्त की जलेबी बनाने लगेगा. ठीक यही ओशो रजनीश जीवन भर कर रहे हैं. वे बुद्ध के अनात्मा या पुनर्जन्म के नकार के सिद्धांत को भी सही बताते हैं और अपने सात सौ साल पुराने जन्म का वर्णन भी करते हैं. और उनके अंधे भक्त इन दोनों बातों पर ताली बजा बजाकर कीर्तन करते हैं. इससे बड़ा मजाक न दुनिया में कभी हुआ है न आगे होगा.

ब्राह्मणवाद और ओशो रजनीश जैसे धूर्त गुरु इसी तरह भारत को हर मोड़ पर पाखंड के दलदल में वापस घसीटते रहते हैं. ये भारत का असली दुर्भाग्य है. आज भारत का समाज जिन समस्याओं से जूझ रहा है वो शुद्धतम ब्राह्मणवाद द्वारा पैदा की गयी समस्याएं हैं. इसे गौर से पहिचान लीजिये और ओशो रजनीश जैसे धूर्तों को बेनकाब कीजिये. बुद्ध और कबीर को मिटाने वाले इनके षड्यंत्रों से बचकर रहिये. कम से कम भारत के गरीबों दलितों शूद्रों और स्त्रीयों को इन बाबाओं से बचकर रहना चाहिए.

  – संजय श्रमण जोठे 

( लेखक समाजविज्ञानी व  अन्तर्राष्ट्रीय शोधार्थी हैं )

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